मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमनुस्मृति की भूमिका । विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव । यद्भद्रं तन्न आसुव ॥ (यजु० अ० ३० मं० ३) धर्म । धर्मशास्त्र के अत्यावश्यक कुछ विषय संक्षेप से लिखते हैं जिनके न जानने से वर्तमान काल में बड़ी भारी हानि है। ये विषय प्रायः धर्मसंहिता नामक निबन्ध ग्रन्थ से लिये गये हैं । यहां धर्म शब्द, पङ्कजशब्द के समान योग रूढ़ है । गिरते हुए मनुष्य का जो आधार होकर धारण करता है वह धर्म है। यह धर्म शब्द का अक्षरार्थ कहलाता है । और अनिष्ट से संबन्ध न रखनेवाले इष्टफल का साधन धर्म है । यह धर्मशब्द का प्रसिद्ध अर्थ कहलाता है । भगवान् कणाद मुनि ने वैशेषिकदर्शन में 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः' यह धर्म का लक्षण कहा है । अर्थात् जिस से लौकिक और पारलौकिक सुख प्राप्त हो वह धर्म है। और भगवान् जैमिनि मुनि ने मीमांसादर्शन में 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' यह क्रियासापेक्ष धर्म का लक्षण कहा है । अर्थ-जिस वाक्य के सुनने से कर्तव्य तथा अकर्तव्य कर्म का ज्ञान होवे उस (वाक्य) का चोदना, प्रेरणा, उपदेश और विधि नाम है; जिससे १ यह ग्रन्थ पूज्यपाद श्री ६ दुर्गाप्रसाद द्विवेदीजी, प्रधानाध्यापक, संस्कृत कालेज- जयपुर, का बनाया हुआ है । इसमें धर्मशास्त्र के गूढ़तत्त्वों का विशिष्ठ विवेचन है ।