मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१४ मनुस्मृति । शिक्षित राजा भी ऐसे योग्य ब्राह्मणों से नित्य विनय सीखे । क्योंकि विनीत राजाको कभी हानि नहीं पहुँचती । बहुत से राजा अविनय से धन सम्पत्ति सहित नष्ट होगये और बहुत से जङ्गल में रहकर भी अपने विनय से राज्य पागए हैं । राजा वेन, नहुष, सुदास, यवन, सुमुख और निमि अपने अविनय-दुराचार से नष्ट होगये । पृथु और मनुने विनय से राज्य पाया। कुवेर ने धनाधिपत्य और विश्वामित्र ने ब्राह्मण्य को पाया ॥ ३६-४२ ॥ त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम् । आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्तारम्भांश्च लोकतः ॥ ४३ ॥ इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेदिवानिशम् । जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः ॥ ४४ ॥ दशकामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च । व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥ ४५ ॥ कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः । वियुज्यन्तेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु ॥ ४६ ॥ वेदज्ञों से वेद, दण्डनीति, ब्रह्मविद्या को पढ़े । और अर्थशास्त्र वगैरह व्यवहार विद्या को पढ़े । इन्द्रियों को वश में रखने का सदा उद्योग करे क्योंकि जितेन्द्रिय राजा ही प्रजा को वश में रख सकता है । काम से पैदाहुए दश और क्रोध से पैदाहुए आठ व्यसनों का कोई अन्त नहीं है इनसे राजा को यत्नपूर्वक बचना चाहिए । काम से पैदा व्यसनों में आसक्त राजा अर्थ और धर्म से हीन होजाता है और क्रोध से पैदाहुए व्यसनों में लग जाने से अपने शरीर से ही नष्ट होजाता है ॥ ४३-४६ ॥ मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परीवादः स्त्रियो दमः । तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ ४७ ॥