मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 388, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें२४८ मनुस्मृति । यत्र धर्मो ह्यधर्मेण सत्यं यत्रानृतेन च । हन्यते प्रेक्षमाणानां हतास्तत्र सभासदः ॥ १४ ॥ इन विषयों में झगड़ा करनेवालों का फ़ैसला राजा को सनातन- धर्म के अनुसार करना चाहिए। जब आप कारणवश न काम देख सके तो विद्वान् ब्राह्मण को सौंप देवे। वह ब्राह्मण तीन सभासदों के साथ सभा में बैठकर या खड़े ही राजा के खास कामों को देखे। जिस देश में वेदविशारद तीन ब्राह्मण राजसभा में निर्ण- यार्थ बैठते हैं और राजा का अधिकार पाया हुआ एक विद्वान् ब्राह्मण रहता है वह ब्रह्मा की सभा मानी जाती है। जिस सभा में धर्म, अधर्म से चौंका जाता है और उस चुभे काँटे को सभा- सद् धर्मशरीर से नहीं निकालते तो वे सभासद् पापभागी होते हैं। या तो सभा में न जाना, जाना तो सत्यवचन कहना। और जो जानकर भी कुछ न कहे या झूठ कहे तो वह पातकी होता है। जिस सभा में अधर्म से धर्म की और असत्य से सत्य की हत्या होती है उस सभा के सभासद् नष्ट होजाते हैं ॥ ८-१४ ॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः । तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥ १५ ॥ वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् । वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ॥ १६ ॥ एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः । शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि गच्छति ॥ १७ ॥ धर्म का लोप करदेने से वह उस पुरुष को नष्ट करदेता है और धर्म की रक्षा करने से वह भी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश न करना चाहिए जिसमें नष्ट धर्म हमारा नाश न करे। भगवान् धर्म को 'वृष' कहते हैं और जो उसका नाश करता है उसको देवता 'वृषल' कहते हैं। इस कारण मनुष्य को धर्म