भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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पृष्ठ 396

[Page Header] २५६ : मनुस्मृति ।

[Main Text] तौ नृपेण ह्यधर्मज्ञौ दाप्यौ तद्द्विगुणं दमम् ॥ ५६ ॥ पृष्टोऽपव्ययमानस्तु कृतावस्थो धनैषिणा । त्र्यवरैः साक्षिभिर्भाव्यो नृपब्राह्मणसन्निधौ ॥ ६० ॥ और जो एकान्त में गवाहों के साथ बातचीत करे, जाने हुए प्रश्न का उत्तर न दें, पूंछने पर कुछ न कहें और जो कहें सो दृढ़ता से न कहें जो पूर्वापर बातों को न जानें। ऐसे पुरुष अपने अर्थ- धन से हार जाते हैं। मेरे साक्षी हाज़िर हैं, ऐसा कह कर जो मांगने पर हाज़िर न कर सके, न्यायाधीश उसको भी हरा देय। वादी अपने दावा को सिद्ध न कर सके तो वह धर्मानुसार शिक्षा और दण्ड दोनों का पात्र होता है और जो प्रतिवादी-मुद्दआलेह डेढ़ महीना के भीतर झूठे दावे से हुई हानि की नालिश न कर सकें तो वह भी हारा समझा जाय। प्रतिवादी जितने धन के लिए झूठ बोले और वादी जितने धन का झूठा दावा करे, राजा उन दोनों अधर्मियों को उसका दूना दण्ड करे। अगर राजा और ब्राह्मण के सामने पूंछने पर ऋणी इन्कार करजाय तो तीन गवाह देकर ऋण सत्य करावें ॥ ५५-६० ॥ यादृशा धनिभिः कार्या व्यवहारेषु साक्षिणः । तादृशान् संप्रवक्ष्यामि यथा वाच्यमृतं च तैः ॥ ६१ ॥ गृहिणः पुत्रिणो मौलाः क्षत्रविट्शूद्रयोनयः । अर्थ्युक्ताः साक्ष्यमर्हन्ति न ये केचिदनापदि ॥ ६२ ॥ अब धनियों को और दूसरों को भी कैसे गवाह देने चाहिएं और वे कैसें सच्ची गवाही दें, यह सब कहा जाता है। साक्षी-गवाह। कुटुम्बी, पुत्रवान्, उसी देश का वासी, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये लोग जब वादी बुलावें तो गवाही दे सकते हैं, सब कोई नहीं ॥ ६१-६२॥