भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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२७२ मनुस्मृति ।

श्रोत्रिय का धन इनको दूसरा भोगे तो भी स्वामी का अधिकार नहीं जाता । जो चालाक मनुष्य आधि को बिना स्वामी के कहे भोगता है उसको आधा ब्याज छोड़ देना चाहिए क्योंकि उसका आधा भोग से पट गया ॥ १४८-१५० ॥ कुसीदवृद्धिद्वैगुण्यं नात्येति सकृदाहता । धान्ये सदे लवे वाह्ये नातिक्रामति पञ्चताम् ॥ १५१ ॥ कृतानुसारादधिका व्यतिरिक्ता न सिध्यति । कुसीदपथमाहुस्तं पञ्चकं शतमर्हति ॥ १५२ ॥ – नातिसांवत्सरीं वृद्धिं न चादृष्टां पुनर्हरेत् । चक्रवृद्धिः कालवृद्धिः कारिता कायिका च या ॥१५३॥ ऋणं दातुमशक्तो यः कर्त्तुमिच्छेत्पुनः क्रियाम् । स दत्त्वा निर्जितां वृद्धिं करणं परिवर्तयेत् ॥ १५४ ॥ अदर्शयित्वा तत्रैव हिरण्यं परिवर्तयेत् । यावती संभवेद्वृद्धिस्तावतीं दातुमर्हति ॥ १५५ ॥ कर्ज़ा के रुपयों का सूद एकबार लेने पर, ऋण का धन दूने से अधिक नहीं लिया जा सकता । और धान्य, वृक्ष के मूल, फल, ऊन और वाहन पांचगुने से अधिक नहीं लिये जाते हैं । जो सूद का ठहराव हो चुका है उससे अधिक शास्त्र के खिलाफ़ नहीं मिल सकता है । ब्याज का क़ायदा यही है कि-अधिक से अधिक पांच रुपये सैकड़ा लिया जा सकता है । एक वर्ष में ब्याज मिला- कर, मूल धन दूना हो जाय तो उतना ब्याज न लेय 'व्याज का ब्याज न लेय' नियतकाल बीतने पर दूना तिगुना आदि लेने का ठहराव न करे और उससे कोई काम धोखा देकर न करावे । जो कर्ज़दार पुराना कर्ज़ा अदा न करसके और नया व्यवहार चलाना चाहे तो पुराने काग़ज़ को बदलाकर नया करा लेवे । लेकिन