भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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३०८ । मनुस्मृति । शुल्कं दद्यात्सेवमानः समामिच्छेत् पिता यदि ॥३६६॥ जो इच्छा न करनेवाली कन्या से गमन करे, वह उसी समय वध के योग्य है। पर चाहनेवाली के साथ गमन करे और वह पुरुष सजातीय हो तो वध योग्य नहीं होता। उत्तम जाति के पुरुष को सेवन करनेवाली कन्या पर कुछ भी दण्ड न करे। परन्तु नीच जाति के साथ गमन करती हो तो उसको घर में बंद रक्खे। नीच जाति का पुरुष उत्तम जाति की कन्या से भोग करे तो वध के योग्य है और समान जाति की कन्या को भोगता हो तो वह पुरुष कन्या के पिता की आज्ञा से मूल्य देकर विवाह भी कर सकता है ॥ ३६४-३६६ ॥ अभिषह्य तु यः कन्यां कुर्याद्दर्पेण मानवः । तस्याशुकर्त्ये अङ्गुल्यौ दण्डं चार्हति षट्शतम् ॥ ३६७॥ सकामां दूषयंस्तुल्यो नाङ्गुलिच्छेदमाप्नुयात् । द्विशतं तु दमो दाप्यः प्रसङ्गविनिवृत्तये ॥ ३६८ ॥ कन्यैव कन्यां या कुर्यात्तस्याः स्याद् द्विशतो दमः । शुल्कं च द्विगुणं दद्याच्छिफाश्चैवाप्नुयाद्दश ॥ ३६६ । या तु कन्यां प्रकुर्यात्स्त्री सा सद्यो मौण्ड्यमर्हति । अङ्गुल्योरेव वा छेदं खरेणोद्वहनं तथा ॥ ३७० ॥ भर्तारं लङ्घयेद् या तु स्त्री ज्ञातिगुणदर्पिता । तां श्वभिः खादयेद्राजा संस्थाने बहुसंस्थिते ॥३७१। पुमांसं दाहयेत्पापं शयने तप्त आयसे । अभ्यादध्युश्च काष्ठानि तत्र दह्येत पापकृत् ॥ ३७२ । जो मनुष्य अभिमान और बलात्कार से कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े उसकी दोनों अङ्गुलियां कटवा दें और छः सौ पण दण्ड