मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 450, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३१० मनुस्मृति। शतानि पञ्च दण्ड्यः स्यादिच्छन्त्या सह संगतः॥३७८॥ वैश्य रक्षित ब्राह्मणी से गमन करे तो एक वर्ष क़ैद करके उसका सर्वस्वहरण करे। क्षत्रिय करे तो एक हज़ार पण दण्ड करे और उसका शिर गधे के मूत से मुड़वा देयं । वैश्य और क्षत्रिय, यदि अरक्षित ब्राह्मणी से गमन करें तो वैश्य पर पांच सौ और क्षत्रिय पर हज़ार पण दण्ड करे। वोही दोनों यदि रक्षित ब्राह्मणी से गमन करें, शूद्र की भांति दण्ड पावें अथवा चटाई में लपेट कर जलवा दें। रक्षित ब्राह्मणी से ज़बरदस्ती व्यभिचार करनेवाले ब्राह्मण पर हज़ार पण दण्ड करे और इच्छावाली से गमन करे तो पाँच सौ पण दण्ड करे ॥ ३७५-३७८ ॥ मौण्ड्यं प्राणान्तिको दण्डो ब्राह्मणस्य विधीयते । इतरेषां तु वर्णानां दण्डः प्राणान्तिको भवेत् ॥ ३७६ ॥ न जातु ब्राह्मणं हन्यात्सर्वपापेष्वपि स्थितम् । राष्ट्रादेनं वहिः कुर्यात्समग्रधनमक्षतम् ॥ ३८० ॥ न ब्राह्मणवधाद्भूयानधर्मो विद्यते भुवि । तस्मादस्य वधं राजा मनसापि न चिन्तयेत् ॥ ३८१ ॥ वैश्यश्चेत्क्षत्रियां गुप्तां वैश्यां वा क्षत्रियो व्रजेत् । यो ब्राह्मण्यामगुप्तायां तावुभौ दण्डमर्हतः ॥ ३८२ ॥ ब्राह्मण का शिर मुड़ा देनाही प्राणान्त दण्ड देना है दूसरों को प्राणान्त दण्ड का विधान है। कैसा भी अपराध ब्राह्मण ने किया हो पर उसको प्राणान्त दण्ड कभी न देवे। किन्तु उसको धन स- हित देश से निकाल देवे। ब्राह्मण वध से अधिक कोई अधर्म नहीं है। राजा, ब्राह्मण वध का कभी मन में भी विचार न करे। वैश्य क्षत्रिया से और क्षत्रिय रक्षित वैश्या से व्यभिचार करे तो इन दोनों को अरक्षित ब्राह्मणी से व्यभिचारवाला दण्ड देना चाहिए ॥ ३७६-३८२ ॥