मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११२ मनुस्मृति । 'जिस राजा के नगर में न चोर हैं, न व्यभिचारी हैं, न कुवाच्य कहनेवाले हैं, न लुटेरे हैं, और न मार-पीट करनेवाले हैं वह राजा इन्द्रलोक को पाता है। इन पाँचों का अपने राज्य में निग्रह करने से राजा का राज्य और यश फैलता है। जो यजमान अपने कर्म करानेवाले निर्दोष ऋत्विज् को त्याग दे या जो ऋत्विज् योग्य यजमान को छोड़ दे उन दोनों पर राजा सौ सौ पण दण्ड करे। माता, पिता, स्त्री और पुत्र त्याग के योग्य नहीं होते। इनको पतित न हों तो त्यागनेवाले पर राजा छः सौ पण दण्ड करे। आश्रम- धर्म के लिए झगड़नेवाले द्विजों का राजा कोई फ़ैसला न करे। वे खुद कर लेंगे ॥ ३८६-३६० ॥ यथार्हमेतानभ्यर्च्य ब्राह्मणैः सह पार्थिवः । सान्त्वेन प्रशमय्यादौ स्वधर्मं प्रतिपादयेत् ॥ ३६१ ॥ प्रातिवेश्यानुवेश्यौ च कल्याणे विंशतिद्विजे । अर्हावभोजयन् विप्रो दण्डमर्हति माषकम् ॥ ३६२ ॥ श्रोत्रियः श्रोत्रियं साधुं भूतिकृत्येष्वभोजयन् । तदन्नं द्विगुणं दाप्यो हिरण्यं चैव माषकम् ॥ ३६३ ॥ अन्धो जडः पीठसर्पी सप्तत्या स्थविरश्च यः । श्रोत्रियेषूपकुर्वंश्च न दाप्याः केनचित्करम् ॥ ३६४ ॥ श्रोत्रियं व्याधितार्तौ च बालवृद्धावकिञ्चनम् । महाकुलीनमार्यं च राजा संपूजयेत् सदा ॥ ३६५ ॥ किन्तु अपने सभासदों के साथ इनकी यथोचित पूजा करके प्रथम समझावे फिर स्वधर्म का आदेश करे। यदि कोई उत्सव हो और बीस ब्राह्मणों के भोजन का प्रबन्ध हो तब पड़ोसी और आने जानेवाले हिती को न जिमावे तो उस पुरुष पर एक माषक दण्ड करे। किसी मङ्गलकार्य में वेदज्ञ ब्राह्मण, साधु आदि को भोजन न देने से उसको दूना अन्न और सोना का एक माषक देना होगा।