भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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आठवां अध्याय । ३१३ अन्धा, बहिरा, लूला, सत्तर वर्ष का वूढ़ा और श्रोत्रिय से राजा कोई कर न लेवे। श्रोत्रिय, रोगी, दुःखी, बालक, बूढ़ा, निर्धन, महाकुलीन, और महात्मा पुरुष की तरफ राजा सदा आदर- दृष्टि रक्खे ॥ ३६१-३६५ ॥ शाल्मलीफलके श्लक्ष्णे नेनिज्यान्नेजकः शनैः । न च वासांसि वासोभिर्निहरेन्न च वासयेत् ॥ ३६६ ॥ तन्तुवायेा दशपलं दद्यादेकपलाधिकम् । अतोऽन्यथा वर्तमानो दाप्यो द्वादशकं दमम् ॥ ३६७॥ शुल्कस्थानेषु कुशलाः सर्वपण्यविचक्षणाः । कुर्युर्घ यथापण्यं ततो विंशं नृपो हरेत् ॥ ३६८ ॥ धोबी सेमर के चिकने पाट पर धीरे धीरे कपड़े धोवे, कपड़ों को बदले, नहीं और न बहुत दिनों तक पड़ा रक्खे। जुलाहा दश पल सूत लेकर मांडी के संबध से ग्यारह पल कपड़ा देवे । यदि खिलाफ करे तो उस पर राजा बारह पण दण्ड दिलावे। जो पुरुष चुंगी वगैरह के कामों में चतुर और हर प्रकार के व्यापारों में प्र- वीण हों, उन सौदागरों के लाभ का बीसवाँ भाग राजा ग्रहण करे ॥ ३६६-३६८ ॥ राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिषिद्धानि यानि च । तानि निर्हरतो लोभात्सर्वहारं हरेन्नृपः ॥ ३६६ ॥ शुल्कस्थानं परिहरन्नकाले क्रयविक्रयी । मिथ्यावादी च संख्याने दाप्योऽष्टगुणमत्ययम् ॥४००॥ आगमं निर्गमं स्थानं तथा वृद्धिक्षयावुभौ । विचार्य सर्वपण्यानां कारयेत्क्रयविक्रयौ ॥ ४०१ ॥ पञ्चरात्रे पञ्चरात्रे पक्षे पक्षेऽथवा गते । ४०