भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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३१४ मनुस्मृति। कुर्वीत चैषां प्रत्यक्षमर्घसंस्थापनं नृपः ॥ ४०२ ॥ तुलामानं प्रतीमानं सर्वं च स्यात्सुलक्षितम् । षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेत् ॥ ४०३ ॥ राजा अपने देश के जिन प्रसिद्ध वस्तुओं को परदेश में व्यापारार्थ जाने से रोके उनको लोभवश कोई लेजाय तो राजा उसका सर्वस्व छीन लेय । चुंगीघर से छिपानेवाला, असमय में खरीद-बेच करनेवाला, गिनती-तौल में झूठ बोलनेवाला वस्तु के मूल्य से आठ गुणा दण्ड के योग्य होता है। माल कहां से आया है, कहां जाता है, कितने दिन पड़ा रहा है, उसमें हानि वा लाभ क्या होगा, यह सब विचार कर खरीद-बेच का भाव तै करे । पाँच पाँच दिन अथवा पाँच पाँच पक्ष बीतने पर राजा माल का भाव व्यापारियों के सामने नियत करे । तराजू के बांट और गज़ वगैरह पर अपनी मोहर लगाकर ठीक रक्खे और छठे महीना उनकी जांच किया करे ॥ ३९९-४०३ ॥ पणं यानं तरेद्दाप्यं पौरुषोऽर्धपणं तरे । पादं पशुश्च योषित्च पादार्थं रिक्तकः पुमान् ॥ ४०४ ॥ भाण्डपूर्णानि यानानि तार्यं दाप्यानि सारतः । रिक्तभाण्डानि यत्किञ्चित्पुमांसश्चापरिच्छदाः ॥४०५॥ दीर्घाध्वनि यथादेशं यथाकालं तरो भवेत् । नदीतीरेषु तद्विद्यात्समुद्रे नास्ति लक्षणम् ॥ ४०६ ॥ पुल, नदी का महसूल । नदी पार करने में खाली गाड़ी का एक पण, भार सहित मनुष्यों का आधा पण, पशु और स्त्री का चौथाई पण और खाली मनुष्य से पणका आठवाँ भाग महसूल लेय । मालभरी गाड़ी पार उतरने का महसूल बोझा के अनुसार लेय और खाली सवारी