भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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३५४ मनुस्मृति। पावे उसमें इच्छा न हो तो भाइयों को भाग न दे। पिता के पिता का धन जिसको कोई न पासका हो उसको पिता पावे और इच्छा न हो तो बाँट कर न दे, क्योंकि वह उसने स्वयं पाया है। भाई एक बार जुदा होकर फिर साथ रहें और फिर बाँट क- रना चाहें तो समभाग करें। उस समय बड़े भाई का अधिक भाग नहीं लगता। जिन भाइयों में बड़ा वा छोटा भाई बांट के समय संन्यासी होगया हो या मरगया हो तो भी उसका भाग नष्ट नहीं होता। यदि उसके पुत्र, पुत्री, स्त्री, माता-पिता न हों तो सगे भाई या सहोदर बहने आपस में विभाग कर लें। यदि बड़ा भाई छोटे भाई को लोभ से धोखा दे तो उसको बड़ा न माने, अधिक भाग न दे और राजा उसको दण्ड देवे ॥ २०६-२१३ ॥ सर्व एव विकर्मस्था नार्हन्ति भ्रातरो धनम् । न चादत्त्वा कनिष्ठेभ्यो ज्येष्ठः कुर्वीत यौतुकम् ॥ २१४ ॥ भ्रातॄणामविभक्तानां यद्युत्थानं भवेत्सह । न पुत्रभागं विषमं पिता दद्यात्कथंचन ॥ २१५ ॥ ऊर्ध्वं विभागाज्जातस्तु पित्र्यमेव हरेद्धनम् । संसृष्टास्तेन वा ये स्युर्विभजेत स तैः सह ॥ २१६ ॥ अनपत्यस्य पुत्रस्य मातादायमवाप्नुयात् । मातर्यपि च वृत्तायां पितुर्माता हरेद्धनम् ॥ २१७ ॥ ऋणे धने च सर्वस्मिन् प्रविभक्ते यथाविधि । पश्चाद्दृश्येत यत्किञ्चित्तत्सर्वं समतां नयेत् ॥ २१८ ॥ वस्त्रं पत्रमलङ्कारं कृतान्नमुदकं स्त्रियः । योगक्षेमं प्रचारं च न विभाज्यं प्रचक्षते ॥ २१९ ॥ अयमुक्तो विभागो वः पुत्राणां च क्रियाविधिः । क्रमशः क्षेत्रजादीनां द्यूतधर्मं निबोधत ॥ २२० ॥