भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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नवां अध्याय । ३५७ आनृण्यं कर्मणा गच्छेद्विप्रो दद्याच्छनैः शनैः॥२२६॥ स्त्रीवालोन्मत्तवृद्धानां दरिद्राणां च रोगिणाम् । शिफाविदलज्वाद्यैर्विदध्यान्नृपतिर्दमम् ॥ २३०॥ ये नियुक्तास्तु कार्येषु हन्युः कार्याणि कार्यिणाम् । धनोष्मणा पच्यमानास्तान्निःस्वान्कारयेन्नृपः॥२३१॥ कूटशासनकर्तॄंश्च प्रकृतीनां च दूषकान् । स्त्रीवालब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा॥२३२॥ तीरितं चानुशिष्टं च यत्र क्वचन यद्भवेत् । कृतं तद्धर्मतो विद्यान्नतद्भूयो निवर्त्तयेत् ॥ २३३ ॥ जो कोई छिपकर या प्रकटरीति से जुआ खेले उसको राजा इच्छानुसार दण्ड देवे । क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दण्ड न देसकता हो तो मज़दूरी करके दण्ड चुकावे और ब्राह्मण धीरे धीरे देडाले । स्त्री, बालक, पागल, बूढ़ा, निर्धन और रोगियों को चाबुक, बेंत और रस्सी से शिक्षा देय। जिन कर्मचारियों को राज्यकार्य सौंपा हो, वे यदि धनकी गरमी से लोगों के काम बिगाड़ें तो राजा उन का सब धन छीन लेय। राजा की तरफ से बनावटी आज्ञा करने वाले, मंत्रियों में बिगाड़ करानेवाले, स्त्री, बालक और ब्राह्मण- घातक और शत्रु से मिलनेवाले को राजा दण्ड देयं। जिस मामले का न्यायानुसार दण्ड तक निर्णय होचुका हो उसको पूरा समझे फिर न दोहरावे ॥ २२८-२३३ ॥ अमात्याः प्राड्विवाको वा यत्कुर्युः कार्यमन्यथा । तत्स्वयं नृपतिः कुर्यात्तान्सहस्रं च दण्डयेत् ॥ २३४ ॥ ब्रह्महा च सुरापश्च स्तेयो च गुरुतल्पगः । एते सर्वे पृथक् ज्ञेया महापातकिनो नराः ॥ २३५ ॥