मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७४ . मनुस्मृति । विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् । शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥ शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः । ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥ एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः । आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥ इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥ गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण, अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्, गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक, मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥ नवां अध्याय पूरा हुआ ।