भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पाश्चात्त्य-दर्शन

अनेकात्मक प्रपञ्चका मूल एक वस्तु है, यह खोज भी महत्त्वकी ही है। एनैक्सिमैण्डर ज्योतिष एवं भूगोलका विद्वान् था। उसने एक अपरिच्छिन्न परिमाणवाले द्रव्यसे ही विश्वकी उत्पत्ति और उसीमे संसारका लीन होना माना है। यदि यह द्रव्य परिमित होता तो सृष्टि होते-होते समाप्त हो जाती। अतः यह द्रव्य अपरिमित अतएव अनश्वर है। इसकी गति भी शाश्वत है। यह स्वयं विशेष पदार्थ नही है, किंतु सब विशेष पदार्थ इसीसे निकलते है। शीत-उष्णका भेद, पृथ्वी, जल, वायु आदि सब इसीसे निकले। यह स्वयं थैलीजका सहवासी था और इसका शिष्य एनैक्सिमैनीज था। इसने (एनैक्सिमैनीज) प्रथम द्रव्य वायुको माना है। वायुमे ही शीतलता तथा उष्णतासे घनीभाव और शैथिल्य ये दो गुण प्रकट होते है। वायुके शैत्यसे जल एव उष्णतासे अग्नि प्रकट होती है। जैसे प्राणके आधारपर प्राणीका देह होता है, वैसे ही वायुके आधारपर संसार स्थित है। हिप्पो थैलीजका ही अनुगामी था। वह आर्द्रतासे अग्नि और अग्नि तथा जलके सङ्घर्षसे ससारका होना मानता था। ईडियस एव डीयोजेनीज़ वायुको ही मूल कारण मानते थे, परंतु एनैक्सिगोरस अनेक तत्त्वो- का अस्तित्व मानता था। साथ ही वह ईश्वरकी इच्छासे ही इन तत्त्वोके द्वारा सृष्टि स्वीकार करता था। पीथागोरसने सख्याको ही मूल माना है। वह ईश्वरको एक सख्या तथा अन्य अङ्कोका उसीसे निकलना मानता था। एकसे बहुतोकी उत्पत्ति होती है। बहुत सम्भव है कि यह 'एकोऽहं बहु स्याम्' (एक मै अनेक होकर व्यक्त हो जाऊँ) इस श्रौतसिद्धान्तका ही रूपान्तर हो। एनैक्सिमैण्डर (ई० पू० ६४० से ५५०) का कथन है कि 'जो कुछ भी जाना जाता है वह मूल नही है। मूल तत्त्व तोकोई और ही है, जिसमे पृथ्वी- जल, अग्नि, वायु और आकाश--इन पाँच तत्त्वोका जन्म होता है और जिसे 'असीम' नाम दिया जा सकता है। वही घन-विरलभावसे विश्वरूपमे परिणत और उपरत होता रहता है।' पीथागोरस (ई० पू० ५७०-५००) तो मूल तत्त्वके सूक्ष्म रूपको ही सब कुछ मानता है। इसके अनुसार 'रूपका एक प्रकार अनुपात है। जैसे पित्त, कफ और वातके उचित अनुपातसे स्वास्थ्य और विपरीत होनेपर अस्वास्थ्य होता है, वैसे ही अन्य विषयोमे भी। इसलिये विश्वका मूलवस्तु नही, पर वस्तुका रूप ही है।' उधर परामेनीडीजके मतमे विश्व न कभी उत्पन्न हुआ, न नष्ट ही होगा। भारतीय दर्शनोके लिये यह सब कुछ नया नही है। मीमासकोने कहा है कि 'न कदाचिदनीदृशं जगत्।' अर्थात् यह जगत् कभी भी ऐसा नही रहा, जैसां आज नही है, अर्थात् वह सदा ऐसा ही रहा। सारी गतियाँ बाणकी गतिके समान भ्रमात्मिका ही हैं। बाण किन्ही विशिष्ट स्थानोपर 'सत्' होते हुए भी 'असत्'