भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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( ४ ) लगा । पर लेखका कलेवर धीरे-धीरे बढ़ने लगा । मूल विषयसे सम्बद्ध कितने ही विषय सामने आ गये और उनपर लेखनी चल पड़ी । चातुर्मास्य समाप्त होनेके कुछ ही दिनों बाद श्रीविश्वनाथ- मन्दिर-सत्याग्रह-सम्बन्धी मुकदमेमे उन्हें एक महीनेकी जेल हो गयी। जेलमे लेखका क्रम फिर चल पड़ा। जेलमें मिलने आनेवाले विद्वानों- से बराबर इसी विषयपर चर्चा चलती रहती थी। थोड़े ही दिनोंमें यह अनुभव होने लगा कि विषय केवल मार्क्सवादके दर्शनतक ही सीमित नहीं रह सकता । उसमें तो समस्त पाश्चात्त्य दर्शनकी आलोचना और अपने मतका प्रतिपादन आ जाता है। इसपर एक स्वतन्त्र पुस्तक ही हो सकती है। इस दृष्टिसे अनेक विषयोंका समावेश होने लगा । महीनेभरका कारावास पूरा होनेपर श्रीमहाराजजी यात्रापर फिर निकल पड़े । परंतु अब यात्रामें भी जहाँ कही कुछ अवकाश मिल गया, उन्होंने थोड़ा बहुत लिख डाला । सब सामग्री मिला- कर कई सौ पृष्ठ हो गये । कोई योजना बनाकर क्रमसे उन्होंने पुस्तक नहीं लिखी। जहाँ जिस विषयपर ध्यान चला गया, उसी- पर कुछ-न-कुछ लिख डाला। कभी-कभी कोई ऐसी पुस्तक हाथमें पड़ जाती, जिसमें पूर्वपक्ष मिल गया तो उसीपर कुछ लिख डालते थे। इस तरह कई सौ पृष्ठ लिख डाले गये। यह सामग्री क्रमबद्ध करनेकी कठिन समस्या खड़ी हो गयी। श्रीमहाराजजीको इतना अवकाश नहीं रहा कि वे सब सामग्री पुनः पढ़कर उसे ठीक करते। पुस्तक समाप्त करनेकी दृष्टिसे ही १९५६ का चातुर्मास्य काशीमें ही किया गया। उन दिनों 'कल्याण' सम्पादन-विभागके श्रीजानकीनाथ शर्माने जो जेलमें भी श्रीचरणोंके साथ ही रहे, बड़े परिश्रमसे सब सामग्री क्रमबद्ध करनेका प्रयत्न किया। 'गीताप्रेस, गोरखपुर'ने पुस्तक छापनेकी इच्छा प्रकट की और पाण्डुलिपि उसे भेज दी गयी । पर इसका प्रूफ- संशोधन भी सहज कार्य न था। लेखोंके अंश काट-काटकर क्रमसे एक साथ जोड़े गये थे। प्रेस-कापी ठीक न होनेसे प्रूफ-संशोधनमें बड़ी अड़चनें पड़ीं। पर श्रीजानकीनाथजीने बड़ा परिश्रम किया। फिर भी प्रूफकी अनेक अशुद्धियाँ रह गयी हों तो कोई आश्चर्य नहीं। जिस प्रकार पुस्तक लिखी गयी, उसमें कहीं-कहीं क्रम कुछ टूट जाना या कहीं पुनरुक्ति हो जाना अनिवार्य था, पर तब भी लेखोका ऐसा क्रम बना दिया गया कि पढ़नेसे विचारधारा कहीं टूटती नहीं। पुस्तकमें पाश्चात्त्य मतकी आलोचनाके साथ अपने पक्षका प्रवल प्रतिपादन किया गया है। अपने यहाँकी प्राचीन शैली है कि पहले