भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पूर्वपक्ष चलता है फिर उत्तरपक्ष । इस पुस्तकमें भी उसीका अनुसरण किया गया है। फलतः यदि किसी विषयका एक स्थलपर विवेचन हो गया, तो फिर उसे उस परिच्छेदमें विस्तारपूर्वक नहीं उठाया गया है, जिसका वह मूल विषय है । पुस्तकके पढ़नेसे सबसे बड़ा लाभ यह है कि दोनों पक्षोंका समुचित ज्ञान हो जाता है। पर पढ़नेके लिये चाहिये धैर्य और जिज्ञासा । पुस्तकके कुछ पन्ने उलट देने या एकाध अध्याय पढ़ लेनेमात्रसे प्रतिपाद्य विषयका पूरा ज्ञान नहीं हो सकता । पुस्तकके नामके सम्बन्धमे भी कुछ विचार चला । यद्यपि 'मार्क्सवाद' शब्द रखा गया है, पर उसके साथ समस्त पाश्चात्त्य दर्शनका आलोचन आ गया है । मार्क्सवादका बहुत कुछ सम्बन्ध राजनीतिसे है। उसके जोड़में 'रामराज्य' शब्द ही ऐसा है, जिसमें समस्त भारतीय राजनीतिका समावेश हो जाता है। दोनोंका ही आधार दर्शन है । इस दृष्टिसे सभी दार्शनिक विषय भी आ जाते हैं । दोनोंके मूल सिद्धान्त लेकर ही विचार उठाया गया है। पर इतनेसे ही उसका क्षेत्र इतना व्यापक हो गया कि जिसमें धार्मिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सभी प्रकारके विषयोंपर विचार चल पड़ा । इसीलिये किसी विषयपर कोई अध्याय पढ़ लेने मात्रसे उसका सम्यक् ज्ञान नहीं हो सकता । सभी विषय एक दूसरेसे सम्बद्ध हैं। अतः पुस्तकको आदिसे अन्ततक पढ़ लेना आवश्यक है। अभीतक कोई ऐसी पुस्तक उपलब्ध नहीं थी जिसमें प्राच्य और पाश्चात्त्य आधारभूत सिद्धान्तोंका इतना सूक्ष्म और विस्तृत विवेचन किया गया हो । इस अभावकी पूर्ति इस पुस्तकसे हो जाती है। यह बहुत आवश्यक है कि इस पुस्तकका अंग्रेजीमें अनुवाद निकाला जाय, जिससे विदेशी विद्वान् और ऐसे भारतीय विद्वान् भी, जो हिंदी नहीं जानते, लाभ उठा सकें । पुस्तकपर गम्भीर विचारकी आवश्यकता है । इसमें यह आग्रह नहीं कि अपना ही पक्ष माना जाय । श्रीस्वामीजी महाराजकी यह विशेषता है कि वे आलोचनाका सदा स्वागत करते हैं और विचार-विनिमयके लिये प्रस्तुत रहते हैं। अपने देशमें कम्युनिस्टोंकी संख्या कुछ कम नहीं, पर उनमेंसे कितने ऐसे हैं, जिन्होंने मार्क्सवादका अच्छी तरह अध्ययन किया है। केवल कम्युनिस्टोंसे ही नहीं, पाश्चात्त्यदर्शनके सभी विद्वानोंसे ही अनुरोध है कि वे एकबार यह पुस्तक पढ़कर विचार-विनिमयका मार्ग प्रशस्त करें।