भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१६ * मत्स्यपुराण *


| ततो लयान्ते सर्वस्य स्थावरस्य चरस्य च।<br>प्रजापतित्वं भविता जगतः पृथिवीपते॥ ३४<br><br>एवं कृतयुगस्यादौ सर्वज्ञो धृतिमान् नृपः।<br>मन्वन्तराधिपश्चापि देवपूज्यो भविष्यसि॥ ३५ | तदनन्तर पृथिवीपते! प्रलयकी समाप्तिमें तुम जगत्के समस्त स्थावर-जङ्गम प्राणियोंके प्रजापति होओगे। इस प्रकार कृतयुगके प्रारम्भमें सर्वज्ञ एवं धैर्यशाली नरेशके रूपमें तुम मन्वन्तरके भी अधिपति होओगे, उस समय देवगण तुम्हारी पूजा करेंगे॥ १८–३५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मनुमत्स्यसंवादे प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें मनु-विष्णु-संवादमें प्रथम अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १॥


दूसरा अध्याय

मनुका मत्स्यभगवान्‌से युगान्तविषयक प्रश्न, मत्स्यका प्रलयके स्वरूपका वर्णन करके अन्तर्धान हो जाना, प्रलयकाल उपस्थित होनेपर मनुका जीवोंको नौकापर चढ़ाकर उसे महामत्स्यके सींगमें शेषनागकी रस्सीसे बाँधना एवं उनसे सृष्टि आदिके विषयमें विविध प्रश्न करना और मत्स्यभगवान्‌का उत्तर देना

| सूत उवाच<br>एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रच्छ मधुसूदनम्।<br>भगवन् कियद्भिर्वर्षैर्भविष्यत्यन्तरक्षयः॥ १<br>सत्त्वानि च कथं नाथ रक्षिष्ये मधुसूदन।<br>त्वया सह पुनर्योगः कथं वा भविता मम॥ २<br><br>मत्स्य उवाच<br>अद्यप्रभृत्यनावृष्टिर्भविष्यति महीतले।<br>यावद् वर्षशतं साग्रं दुर्भिक्षमशुभावहम्॥ ३<br>ततोऽल्पसत्त्वक्षयदा रश्मयः सप्त दारुणाः।<br>सप्तसप्तेर्भविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारवर्षिणः॥ ४<br>और्वानलोऽपि विकृतिं गमिष्यति युगक्षये।<br>विषाग्निश्चापि पातालात् संकर्षणमुखाच्च्युतः।<br>भवस्यापि ललाटोत्थतृतीयनयनानलः॥ ५<br>त्रिजगन्निर्दहन् क्षोभं समेष्यति महामुने।<br>एवं दग्धा मही सर्वा यदा स्याद् भस्मसंनिभा॥ ६<br>आकाशमूष्मणा तप्तं भविष्यति परंतप।<br>ततः सदेवनक्षत्रं जगद् यास्यति संक्षयम्॥ ७<br>संवर्तो भीमनादश्च द्रोणश्चण्डो बलाहकः।<br>विद्युत्पताकः शोणस्तु सप्तैते लयवारिदाः॥ ८ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् मत्स्यद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर मनुने उन मधुसूदनसे प्रश्न किया—'भगवन्! यह युगान्त-प्रलय कितने वर्षों बाद आयेगा? नाथ! मैं सम्पूर्ण जीवोंकी रक्षा किस प्रकार कर सकूँगा? तथा मधुसूदन! आपके साथ मेरा पुनः सम्मिलन कैसे हो सकेगा?'॥ १-२॥<br><br>मत्स्यभगवान् कहने लगे—'महामुने! आजसे लेकर सौ वर्षतक इस भूतलपर वृष्टि नहीं होगी, जिसके फलस्वरूप परम अमाङ्गलिक एवं अत्यन्त भयंकर दुर्भिक्ष आ पड़ेगा। तदनन्तर युगान्त प्रलयके उपस्थित होनेपर तपे हुए अंगारकी वर्षा करनेवाली सूर्यकी सात भयंकर किरणें छोटे-मोटे जीवोंका संहार करनेमें प्रवृत्त हो जायँगी। बडवानल भी अत्यन्त भयानक रूप धारण कर लेगा। पाताललोकसे ऊपर उठकर संकर्षणके मुखसे निकली हुई विषाग्नि तथा भगवान् रुद्रके ललाटसे उत्पन्न तीसरे नेत्रकी अग्नि भी तीनों लोकोंको भस्म करती हुई भभक उठेगी। परंतप! इस प्रकार जब सारी पृथ्‍वी जलकर राखकी ढेर बन जायगी और गगन-मण्डल ऊष्मासे संतप्त हो उठेगा, तब देवताओं और नक्षत्रोंसहित सारा जगत् नष्ट हो जायगा। उस समय संवर्त, भीमनाद, द्रोण, चण्ड, बलाहक, विद्युत्पताक और शोण नामक जो ये सात प्रलयकारक मेघ हैं, ये सभी |