भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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१८* मत्स्यपुराण *

| मनुरुवाच | मनुने पूछा— भगवन्! सृष्टिकी उत्पत्ति और उसका संहार, मानव-वंश, मन्वन्तर, मानव-वंशमें उत्पन्न हुए लोगोंके चरित्र, भुवनका विस्तार, दान और धर्मकी विधि, सनातन श्राद्धकल्प, वर्ण और आश्रमका विभाग, इष्टापूर्त (वापी, कूप, तड़ाग आदि)-के निर्माणकी विधि और देवताओंकी प्रतिष्ठा आदि तथा और भी जो कोई धार्मिक विषय भूतलपर विद्यमान हैं, उन सभीका आप मुझसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये॥२२—२४॥ | | उत्पत्तिं प्रलयं चैव वंशान् मन्वन्तराणि च।<br>वंश्यानुचरितं चैव भुवनस्य च विस्तरम्॥ २२<br>दानधर्मविधिं चैव श्राद्धकल्पं च शाश्वतम्।<br>वर्णाश्रमविभागं च तथेष्टापूर्तसंज्ञितम्॥ २३<br>देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद् विद्यते भुवि।<br>तत्सर्वं विस्तरेण त्वं धर्मं व्याख्यातुमर्हसि॥ २४ | | | मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान् कहने लगे— महाप्रलयके समयका अवसान होनेपर यह सारा स्थावर-जङ्गमस्वरूप जगत् सोये हुएकी भाँति अन्धकारसे आच्छन्न था। न तो इसके विषयमें कोई कल्पना ही की जा सकती थी, न कोई वस्तु जानी ही जा सकती थी, न किसी वस्तुका कोई चिह्न ही अवशेष था। सभी वस्तुएँ विस्मृत हो चुकी थीं। कोई ज्ञातव्य वस्तु रह ही नहीं गयी थी। तदनन्तर जो पुण्यकर्मोंके उत्पत्ति-स्थान तथा निराकार हैं, वे स्वयम्भूभगवान् इस समस्त जगत्को प्रकट करनेके अभिप्रायसे अन्धकारका भेदन करके प्रादुर्भूत हुए। उस समय जो इन्द्रियोंसे परे, परात्पर, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, महान्‌से भी महान्, अविनाशी और नारायण नामसे विख्यात हैं, वे स्वयं अकेले ही आविर्भूत हुए। उन्होंने अपने शरीरसे अनेक प्रकारके जगत्की सृष्टि करनेकी इच्छासे (पूर्वसृष्टिका) भलीभाँति ध्यान करके प्रथमतः जलकी ही रचना की और उसमें (अपने वीर्यस्वरूप) बीजका निक्षेप किया। वही बीज एक हजार वर्ष व्यतीत होनेपर सुवर्ण एवं रजतमय अण्डेके रूपमें परिणत हो गया, उसकी कान्ति दस सहस्र सूर्योंके सदृश थी। तत्पश्चात् महातेजस्वी स्वयम्भू स्वयं ही उस अण्डेके भीतर प्रविष्ट हो गये तथा अपने प्रभावसे एवं उस अण्डेमें सर्वत्र व्याप्त होनेके कारण वे पुनः विष्णुभावको प्राप्त हो गये। तदनन्तर उस अण्डेके भीतर सर्वप्रथम ये भगवान् सूर्य उत्पन्न हुए, जो आदिसे प्रकट होनेके कारण 'आदित्य' और वेदोंका पाठ करनेसे 'ब्रह्मा' नामसे विख्यात हुए। उन्होंने ही उस अण्डेको दो भागोंमें विभक्त कर स्वर्गलोक और भूतलकी रचना की तथा उन दोनोंके मध्यमें सम्पूर्ण दिशाओं और अविनाशी आकाशका निर्माण किया। उस समय उस अण्डेके जरायु-भागसे मेरु आदि सातों पर्वत प्रकट हुए और जो उल्ब (गर्भाशय) था, वह विद्युतसमूहसहित मेघमण्डलके रूपमें परिणत हुआ तथा उसी अण्डेसे नदियाँ, पितृगण और मनुसमुदाय उत्पन्न हुए। नाना रत्नोंसे परिपूर्ण जो ये लवण, इक्षु, सुरा आदि सातों समुद्र हैं, वे भी उस अण्डेके अन्तःस्थित जलसे प्रकट हुए। | | महाप्रलयकालान्त एतदासीत् तमोमयम्।<br>प्रसुप्तमिव चातर्क्यमप्रज्ञातमलक्षणम्॥ २५<br>अविज्ञेयमविज्ञातं जगत् स्थास्नु चरिष्णु च।<br>ततः स्वयम्भूव्यक्तः प्रभवः पुण्यकर्मणाम्॥ २६<br>व्यञ्जयन्नेतदखिलं प्रादुरासीत् तमोनुदः।<br>योऽतीन्द्रियः परो व्यक्तादणुर्ज्यायान् सनातनः।<br>नारायण इति ख्यातः स एकः स्वयमुद्बभौ॥ २७<br>यः शरीरादभिध्याय सिसृक्षुर्विविधं जगत्।<br>अप एव ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्॥ २८<br>तदेवाण्डं समभवद्धेमरूप्यमयं महत्।<br>संवत्सरसहस्रेण सूर्य्यायुतसमप्रभम्॥ २९<br>प्रविश्यान्तर्महातेजाः स्वयमेवात्मसम्भवः।<br>प्रभावादपि तद्व्याप्त्या विष्णुत्वमगमत् पुनः॥ ३०<br>तदन्तर्भगवानेश सूर्यः समभवत् पुरा।<br>आदित्यश्चादिभूतत्वाद् ब्रह्मा ब्रह्म पठन्नभूत्॥ ३१<br>दिवं भूमिं समकरोत् तदण्डशकलद्वयम्।<br>स चाकरोद्दिशः सर्वा मध्ये व्योम च शाश्वतम्॥ ३२<br>जरायुर्मेरुमुख्याश्च शैलास्तस्याभवंस्तदा।<br>यदल्बं तदभून्मेघस्तडित्सङ्घातमण्डलम्॥ ३३<br>नद्योऽण्डनाभ्रः सम्भूताः पितरो मनवस्तथा।<br>सप्त येऽमी समुद्राश्च तेऽपि चान्तर्जलोद्भवाः।<br>लवणेक्षुसुराद्याश्च नानारत्नसमन्विताः॥ ३४ | |