भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
कृत्वा वै ब्राह्मणान् सर्वानन्नैर्नानाविधैस्तथा।<br>भुक्त्वा चाक्षारलवणमात्मना च विसर्जयेत्॥ ५०तृप्त करके स्वयं भी क्षार लवणसे रहित अन्नका भोजन करके ब्राह्मणोंको विदा करे॥४२—५०॥
अनुगम्य पदान्यष्टौ पुत्रभार्यासमन्वितः।<br>प्रीयतामत्र देवेशः केशवः क्लेशनाशनः॥ ५१पुत्र और स्त्रीके साथ आठ पगोंतक उनके पीछे-पीछे जाय और इस प्रकार प्रार्थना करे—'हमारे इस कार्यसे देवताओंके स्वामी भगवान् श्रीविष्णु, जो सबका क्लेश दूर करनेवाले हैं, प्रसन्न हों।
शिवस्य हृदये विष्णुर्विष्णोश्च हृदये शिवः।<br>यथान्तरं न पश्यामि तथा मे स्वस्ति चायुषः॥ ५२श्रीशिवके हृदयमें श्रीविष्णु हैं और श्रीविष्णुके हृदयमें श्रीशिव विराजमान हैं। मैं यदि इन दोनोंमें अन्तर न देखता होऊँ तो इस धारणासे मेरी आयु बढ़े तथा कल्याण हो।' यह कहकर
एवमुच्चार्य तान् कुम्भान् गाश्चैव शयनानि च।<br>वासांसि चैव सर्वेषां गृहाणि प्रापयेद् बुधः॥ ५३बुद्धिमान् व्रती उन कलशों, गौओं, शय्याओं तथा वस्त्रोंको सब ब्राह्मणके घर पहुँचा दे।
अभावे बहुशय्यानामेकामपि सुसंस्कृताम्।<br>शय्यां दद्याद् द्विजातेश्च सर्वोपस्करसंयुताम्॥ ५४अधिक शय्याएँ सुलभ न हों तो गृहस्थ पुरुष एक ही सुसज्जित एवं सभी उपकरणोंसे सम्पन्न शय्या ब्राह्मणको दान करे।
इतिहासपुराणानि वाचयित्वातिवाहयेत्।<br>तद्दिनं नरशार्दूल य इच्छेद् विपुलां श्रियम्॥ ५५नरसिंह! जिसे विपुल लक्ष्मीकी अभिलाषा हो, उसे वह दिन इतिहास और पुराणोंके श्रवणमें ही बिताना चाहिये।
तस्मात् त्वं सत्त्वमालम्ब्य भीमसेन विमत्सरः।<br>कुरु व्रतमिदं सम्यक् स्नेहात् तव मयेरितम्॥ ५६अतः भीमसेन! तुम भी सत्त्वगुणका आश्रय ले, मात्सर्यका त्यागकर इस व्रतका सम्यक् प्रकारसे अनुष्ठान करो। (यह बहुत गुप्त व्रत है, किंतु) स्नेहवश मैंने तुम्हें बता दिया है।
त्वया कृतमिदं वीर त्वन्नामाख्यं भविष्यति।<br>सा भीमद्वादशी ह्येषा सर्वपापहरा शुभा।<br>या तु कल्याणिनी नाम पुरा कल्पेषु पठ्यते॥ ५७वीर! तुम्हारे द्वारा इसका अनुष्ठान होनेपर यह व्रत तुम्हारे ही नामसे प्रसिद्ध होगा। इसे लोग 'भीमद्वादशी' कहेंगे। यह भीमद्वादशी सब पापोंको नाश करनेवाली और शुभकारिणी होगी। प्राचीन कल्पोंमें इस व्रतको 'कल्याणिनी व्रत' कहा जाता था।
त्वमादिकर्ता भव सौकरेऽस्मिन्<br>कल्पे महावीरवरप्रधान।<br>यस्याः स्मरन् कीर्तनमप्यशेषं<br>विनष्टपापस्त्रिदशाधिपः स्यात्॥ ५८महान् वीरोंमें श्रेष्ठ वीर भीमसेन! इस वाराहकल्पमें तुम इस व्रतके सर्वप्रथम अनुष्ठानकर्ता बनो। इसका स्मरण और कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्यका सारा पाप नष्ट हो जाता है और वह देवताओंका राजा इन्द्र बन जाता है॥५१–५८॥
कृत्वा च यामप्सरसामधीशा<br>वेश्या कृता ह्यन्यभवान्तरेषु।<br>आभीरकन्यातिकुतूहलेन<br>सैवोर्वशी सम्प्रति नाकपृष्ठे॥ ५९जन्मान्तरमें एक अहीरकी कन्याने अत्यन्त कुतूहलवश इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके फलस्वरूप वह वेश्या अप्सराओंकी अधीश्वरी हुई। वही इस समय स्वर्गलोकमें उर्वशी नामसे विख्यात है।
जातातथवा वैश्यकुलोद्भवापि<br>पुलोमकन्या पुरूहूतपत्नी।<br>तत्रापि तस्याः परिचारिकेयं<br>मम प्रिया सम्प्रति सत्यभामा॥ ६०इसी प्रकार वैश्यकुलमें उत्पन्न हुई एक दूसरी कन्याने भी इस व्रतका अनुष्ठान किया था, जिसके परिणामस्वरूप वह पुलोम (दानव)-की पुत्रीरूपमें उत्पन्न होकर इन्द्रकी पत्नी बनी। उसके अनुष्ठान-कालमें जो उसकी सेविका थी,