भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ७९ *२९१
अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां भोजयेद् द्विजान्।<br>यथाशक्त्यथ भुञ्जीत मांसतैलविवर्जितम्॥ ६<br>अनेन विधिना शुक्लसप्तम्यां मासि मासि च।<br>सर्वं समाचरेद् भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ ७<br>व्रतान्ते शयनं दद्यात् सुवर्णकमलान्वितम्।<br>गां च दद्यात् स्वशक्त्या तु सुवर्णाढ्यां पयस्विनीम्॥ ८<br>भोजनासनदीपादीन् दद्यादिष्टानुपस्करान्।<br>अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कमलसप्तमीम्।<br>लक्ष्मीमनन्तामभ्येति सूर्यलोके महीयते॥ ९<br>कल्पे कल्पे ततो लोकान् सप्त गत्वा पृथक् पृथक्।<br>अप्सरोभिः परिवृतस्ततो याति परां गतिम्॥ १०<br>यः पश्यतीदं शृणुयाच्च मर्त्यः<br>पठेच्च भक्त्याथ मतिं ददाति।<br>सोऽप्यत्र लक्ष्मीमचलामवाप्य<br>गन्धर्वविद्याधरलोकभाक् स्यात्॥ ११भी शक्तिके अनुसार विधिपूर्वक सुसज्जित करके दान करे। पुनः दिन-रात बीत जानेके बाद अष्टमी तिथिको अपनी सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन करावे। उसके बाद स्वयं भी मांस और तेलसे रहित अन्नका भोजन करे। प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमीको इसी विधिके अनुसार कंजूसी छोड़कर भक्तिपूर्वक सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये। (एक वर्ष पूर्ण होनेपर) व्रतकी समाप्तिके समय स्वर्णमय कमलके साथ एक शय्याका भी दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्णसे सुसज्जित एक दुधारू गौ तथा भोजन, आसन, दीप आदि अभीष्ट सामग्रियोंके भी दान करनेका विधान है। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार कमलसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है और वह सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वह प्रत्येक कल्पमें अप्सराओंसे घिरा हुआ पृथक्-पृथक् सातों लोकोंमें भ्रमण करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस व्रतको देखता, सुनता, पढ़ता और इसे करनेके लिये सम्मति देता है, वह भी इस लोकमें अचल लक्ष्मीका उपभोग कर अन्तमें गन्धर्व-विद्याधरलोकका भागी होता है॥ १—११॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कमलसप्तमीव्रतं नामाष्टसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कमलसप्तमीव्रत नामक अठहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७८ ॥


उन्यासीवाँ अध्याय

मन्दारसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वकामप्रदां पुण्यां नाम्ना मन्दारसप्तमीम्॥ १<br>माघस्यामलपक्षे तु पञ्चम्यां लघुभुङ्नरः।<br>दन्तकाष्ठं ततः कृत्वा षष्ठीमुपवसेद् बुधः॥ २<br>विप्रान् सम्पूजयित्वा तु मन्दारं प्राशयेन्निशि।<br>ततः प्रभात उत्थाय कृत्वा स्नानं पुनर्द्विजान्॥ ३ईश्वरने कहा— ब्रह्मन्! अब मैं परम पुण्यप्रदायिनी मन्दारसप्तमीका वर्णन करता हूँ, जो समस्त पापोंकी विनाशिनी एवं सम्पूर्ण कामनाओंकी प्रदात्री है। बुद्धिमान् व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिको थोड़ा आहार करके (रात्रिमें शयन करे)। पुनः षष्ठी तिथिको प्रातःकाल दातून कर दिनभर उपवास करे। रातमें ब्राह्मणोंकी पूजा कर मन्दार-पुष्पका भक्षण करे और सो जाय। तत्पश्चात् सप्तमी* तिथिको प्रातःकाल उठकर स्नान आदि नित्यकर्म सम्पादन कर

* पाद्म, वायव्यादि विविध माघमाहात्म्यों एवं 'व्रतरत्न' आदि व्रतनिबन्धोंमें इसी तिथिको अचलासप्तमी, रथसप्तमी, रथाङ्गसप्तमी, महासप्तमी आदि कहकर अन्य व्रत भी निर्दिष्ट हैं।