भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२९२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भोजयेच्छक्तितः कुर्यात् मन्दारकुसुमाष्टकम्।<br>सौवर्णं पुरुषं तद्वत् पद्महस्तं सुशोभनम्॥ ४<br><br>पद्मं कृष्णातिलैः कृत्वा ताम्रपात्रेऽष्टपत्रकम्।<br>हेममन्दारकुसुमैर्भास्करायेति पूर्वतः॥ ५<br><br>नमस्कारेण तद्वच्च सूर्यायेत्यानले दले।<br>दक्षिणे तद्वदर्काय तथार्यम्णेति नैर्ऋते॥ ६<br><br>पश्चिमे वेदधाम्ने च वायव्ये चण्डभानवे।<br>पूष्णोत्युत्तरतः पूज्यमानन्दायैत्यतः परम्॥ ७<br><br>कर्णिकायां च पुरुषं स्थाप्य सर्वात्मनेति च।<br>शुक्लवस्त्रैः समावेष्ट्य भक्ष्यैर्माल्पफलादिभिः॥ ८अपनी शक्तिके अनुसार पुनः ब्राह्मणोंको भोजन करावे। तदनन्तर सोनेके आठ मन्दार-पुष्प और एक पुरुषाकार सुन्दर मूर्ति बनवाये, जिसके हाथमें कमल सुशोभित हो। पुनः ताँबेके पात्रमें काले तिलोंसे अष्टदल कमलकी रचना करे। तदनन्तर स्वर्णमय मन्दार-पुष्पोंद्वारा (कमलके आठों दलोंपर वक्ष्यमाण-मन्त्रोंका उच्चारण करके सूर्यका आवाहन करे। यथा—) 'भास्कराय नमः' से पूर्वदलपर, 'सूर्याय नमः' से अग्निकोणस्थित दलपर, 'अर्काय नमः' से दक्षिणदलपर, 'अर्यम्णे नमः' से नैर्ऋत्यकोणवाले दलपर, 'वेदधाम्ने नमः' से पश्चिमदलपर, 'चण्डभानवे नमः' से वायव्यकोणस्थित दलपर, 'पूष्णे नमः' से उत्तरदलपर, उसके बाद 'आनन्दाय नमः' से ईशानकोणवाले दलपर स्थापना करके कर्णिकाके मध्यमें 'सर्वात्मने नमः' कहकर पुरुषाकार मूर्तिको स्थापित कर दे तथा उसे श्वेत वस्त्रोंसे ढँककर खाद्य पदार्थ (नैवेद्य), पुष्पमाला, फल आदिसे उसकी अर्चना करे॥ १-८॥
एवमभ्यर्च्य तत् सर्वं दद्याद् वेदविदे पुनः।<br>भुञ्जीतातैललवणं वाग्यतः प्राङ्मुखो गृही॥ ९<br><br>अनेन विधिना सर्वं सप्तम्यां मासि मासि च।<br>कुर्यात् संवत्सरं यावद् वित्तशाठ्यविवर्जितः॥ १०इस प्रकार गृहस्थ व्रती उस मूर्तिका पूजन कर पुनः वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे और स्वयं पूर्वाभिमुख बैठकर मौन हो तेल और नमकरहित अन्नका भोजन करे। इस प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक मासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको इसी विधिके अनुसार सारा कार्य सम्पन्न करनेका विधान है। इसमें कृपणता नहीं करनी चाहिये।
एतदेव व्रतान्ते तु निधाय कलशोपरि।<br>गोभिर्विभवतः सार्धं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ ११व्रतकी समाप्तिके समय वैभवकी अभिलाषा रखनेवाला व्रती उस मूर्तिको कलशके ऊपर रखकर अपनी धन-सम्पत्तिके अनुसार प्रस्तुत की गयी गौओंके साथ दान कर दे।
नमो मन्दारनाथाय मन्दारभवनाय च।<br>त्वं रवे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्॥ १२(उस समय सूर्यभगवान्से यों प्रार्थना करे—) 'सूर्यदेव! आप मन्दारके स्वामी हैं और मन्दार आपका भवन है, आपको नमस्कार है। आप हमलोगोंका इस संसाररूपी सागरसे उद्धार कीजिये।'
अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मन्दारसप्तमीम्।<br>विपाप्मा स सुखी मर्त्यः कल्पं च दिवि मोदते॥ १३जो मानव उपर्युक्त विधिके अनुसार इस मन्दारसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह पापरहित हो सुखपूर्वक एक कल्पतक स्वर्गमें आनन्दका उपभोग करता है।
इमामघौघपटलभीषणध्वान्तदीपिकाम् ।<br>गच्छन् संगृह्य संसारशर्वर्यां न स्खलेन्नरः॥ १४यह सप्तमीव्रत पापसमूहरूप परदेसे आच्छादित होनेके कारण प्रकट हुए भयंकर अन्धकारके लिये दीपकके समान है, जो मनुष्य इसे हाथमें लेकर संसाररूपी रात्रिमें यात्रा करता है, वह कहीं पथभ्रष्ट नहीं होता।
मन्दारसप्तमीमेतामीप्सितार्थफलप्रदाम् ।<br>यः पठेच्छृणुयाद् वापि सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ १५जो मनुष्य अभीष्ट फल प्रदान करनेवाली इस मन्दारसप्तमीके व्रतको पढ़ता अथवा श्रवण करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ९-१५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्दारसप्तमीव्रतं नामैकोनाशीतितमोऽध्यायः॥ ७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्दारसप्तमीव्रत नामक उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७९॥