भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304
२९४* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्महत्यासहस्रस्य भ्रूणहत्याशतस्य च।<br>नाशयालमियं पुण्या पठ्यते शुभसप्तमी ॥ १२<br>इमां पठेद् यः शृणुयान्मुहूर्तं<br>पश्येत् प्रसङ्गादपि दीयमानम्।<br>सोऽप्यत्र सर्वाघविमुक्तदेहः<br>प्राप्नोति विद्याधरनायकत्वम् ॥ १३<br>यावत् समाः सप्त नरः करोति<br>यः सप्तमीं सप्तविधानयुक्ताम्।<br>स सप्तलोकाधिपतिः क्रमेण<br>भूत्वा पदं याति परं मुरारेः ॥ १४ ।आदिमें उत्पन्न होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। यह पुण्यप्रद शुभसप्तमी एक हजार ब्रह्महत्या और एक सौ भ्रूणहत्याके पापोंका नाश करनेके लिये समर्थ कही जाती है। जो मनुष्य इस व्रत-विधिको पढ़ता अथवा दो घड़ीतक सुनता है तथा प्रसङ्गवश दिये जाते हुए दानको देखता है, वह भी इस लोकमें समस्त पापोंसे विमुक्त होकर परलोकमें विद्याधरोंके अधिनायक-पदको प्राप्त करता है। जो मनुष्य उपर्युक्त सात विधानोंसे युक्त इस सप्तमीव्रतका सात वर्षोंतक अनुष्ठान करता है, वह क्रमशः सातों लोकोंका अधिपति होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके परमपदको प्राप्त हो जाता है॥ १०—१४॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे शुभसप्तमीव्रतं नामाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुभसप्तमीव्रत नामक अस्सीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८०॥


इक्यासीवाँ अध्याय

विशोकद्वादशीव्रतकी विधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>किमभीष्टवियोगशोकसंघा-<br>दलमुद्धर्तुमुपोषणं व्रतं वा।<br>विभवोद्भवकारि भूतलेऽस्मिन्<br>भवभीतेरपि सूदनं च पुंसः ॥ १मनुने पूछा— भगवन्! इस भूतलपर कौन ऐसा उपवास या व्रत है, जो मनुष्यके अभीष्ट वस्तुओंके वियोगसे उत्पन्न शोकसमूहसे उद्धार करनेमें समर्थ, धन-सम्पत्तिकी वृद्धि करनेवाला और संसार-भयका नाशक है ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>परिपृष्टमिदं जगत्प्रियं ते<br>विबुधानामपि दुर्लभं महत्त्वात्।<br>तव भक्तिमतस्तथापि वक्ष्ये<br>व्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥ २<br><br>पुण्यमाश्वयुजे मासि विशोकद्वादशीव्रतम्।<br>दशम्यां लघुभुग्विद्वानारभेन्नियमेन तु ॥ ३<br><br>उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा दन्तधावनपूर्वकम्।<br>एकादश्यां निराहारः सम्यगभ्यर्च्य केशवम्।<br>श्रियं वाभ्यर्च्य विधिवद् भोक्ष्येऽहं चापरेऽहनि ॥ ४मत्स्यभगवान्ने कहा— राजर्षे! तुमने जिस व्रतके विषयमें प्रश्न किया है, यह समस्त जगत्को प्रिय तथा इतना महत्त्वशाली है कि देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। यद्यपि इन्द्र, असुर और मानव भी उसे नहीं जानते, तथापि तुम-जैसे भक्तिमान्के प्रति मैं अवश्य इसका वर्णन करूँगा। उस पुण्यप्रद व्रतका नाम विशोकद्वादशीव्रत है। विद्वान् व्रतीको आश्विनमासमें दशमी तिथिको अल्प आहार करके नियमपूर्वक इस व्रतका आरम्भ करना चाहिये। पुनः एकादशीके दिन व्रती मानव उत्तराभिमुख अथवा पूर्वाभिमुख बैठकर दातून करे, फिर (स्नान आदिसे निवृत्त होकर) निराहार रहकर भगवान् केशव और लक्ष्मीकी विधिपूर्वक भलीभाँति पूजा करे और 'दूसरे दिन