भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६* मत्स्यपुराण *
वासुदेव उवाच
मम वाक्यं च कर्तव्यं महाराज ब्रवीम्यहम्।<br>नित्यं जपस्व जुह्वस्व प्रयागे विगतज्वरः ॥ ७<br>प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर।<br>स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र स्वर्गलोकं न संशयः ॥ ८<br>प्रयागमनुगच्छेद् वा वसते वापि यो नरः।<br>सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति॥ ९<br>प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः।<br>अहङ्कारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते ॥ १०<br>अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढव्रतः।<br>आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते ॥ ११<br>ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम्।<br>न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते ॥ १२<br>बहुपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः।<br>प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धैर्वा नरैः क्वचित् ॥ १३<br>यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर।<br>तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १४<br>ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम।<br>तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेभ्योऽपि विशिष्यते ॥ १५<br>दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथाऽपगाः।<br>माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ ॥ १६<br>स्वस्थो भव महाराज भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम्।<br>पुनर्द्रक्ष्यसि राजेन्द्र यजमानो विशेषतः ॥ १७**भगवान् वासुदेवने कहा—**महाराज युधिष्ठिर! मैं जैसा कह रहा हूँ, मेरे उस वचनका पालन कीजिये। आप प्रयागमें जाकर संतापरहित हो नित्य भगवन्नामका जप और हवन कीजिये तथा हमलोगोंके साथ नित्य प्रयागका स्मरण कीजिये। राजेन्द्र! ऐसा करनेसे आप स्वयं स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेंगे, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। जो मनुष्य प्रयागकी यात्रा करता है अथवा वहाँ निवास करता है, उसका आत्मा समस्त पापोंसे विशुद्ध हो जाता है और वह रुद्रलोकको चला जाता है। जो प्रतिग्रह (दान लेने)-से विमुख, संतुष्ट, जितेन्द्रिय, पवित्र और अहंकारसे दूर रहता है, उसे तीर्थफलकी प्राप्ति होती है। जो क्रोधरहित, ईमानदार, सत्यवादी, दृढ़व्रत और समस्त प्राणियोंके प्रति अपने समान ही व्यवहार करता है, वह तीर्थफलका भागी होता है। महीपते! ऋषियोंने तथा देवताओंने क्रमशः जिन यज्ञोंका विधान बतलाया है, उन यज्ञोंका अनुष्ठान निर्धन मनुष्य नहीं कर सकता; क्योंकि उन यज्ञोंमें बहुत-से उपकरणों तथा नाना प्रकारकी सामग्रियोंकी आवश्यकता पड़ती है। इनका अनुष्ठान तो राजा अथवा कहीं-कहीं कुछ समृद्धिशाली मनुष्य ही कर सकते हैं। नरेश्वर युधिष्ठिर! निर्धन मनुष्योंद्वारा भी जिस विधिका पालन किया जा सकता है और जो पुण्यमें यज्ञफलके समान है, उसे मैं बतला रहा हूँ, सुनो! भरतसत्तम! यह पुण्यमयी तीर्थयात्रा ऋषियोंके लिये भी परम गोपनीय है तथा यज्ञोंसे भी बढ़कर फलदायक है। भरतर्षभ! दस हजार तीर्थ तथा तीन करोड़ नदियाँ माघमासमें गङ्गामें आकर निवास करती हैं। महाराज! आप स्वस्थ हो जायँ और निष्कण्टक राज्यका उपभोग करें। राजेन्द्र! पुनः कभी विशेषरूपसे यज्ञ करते समय आप मुझे देख सकेंगे॥ ७—१७॥
नन्दिकेश्वर उवाच
इत्युक्त्वा स महाभागो वासुदेवो महातपाः।<br>युधिष्ठिरस्य नृपतेस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १८<br>ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः।<br>यथोक्तेनाथ विधिना परां निर्वृतिमागमत् ॥ १९<br>तथा त्वमपि देवर्षे प्रयागाभिमुखो भव।<br>अभिषेकं तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ २०**नन्दिकेश्वर बोले—**नारदजी! महान् भाग्यशाली एवं महान् तपस्वी वसुदेव-नन्दन श्रीकृष्ण महाराज युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये। तदनन्तर महाराज युधिष्ठिरने सकुदुम्ब प्रयागमें जाकर यथोक्त विधिके अनुसार स्नान किया, जिससे उन्हें परम शान्ति प्राप्त हुई। देवर्षे! इसलिये आप भी प्रयागकी ओर पधारिये और वहाँ स्नान कर आज ही कृतकृत्य हो जाइये॥ १८—२०॥
सूत उवाच
एवमुक्त्वाथ नन्दीशस्तत्रैवान्तरधीयत।<br>नारदोऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुखस्तथा ॥ २१**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! तदनन्तर नन्दिकेश्वर ऐसा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गये तथा नारदजी भी शीघ्र ही प्रयागकी ओर चल दिये।