मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 388, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 388
| ३७८ | * मत्स्यपुराण * |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्वतप्रभावैश्च नदीभिस्तु समंततः।<br>प्रागायता महापाश्र्वाः षडिमे वर्षपर्वताः॥ १०<br>अवगाह्य ह्युभयतः समुद्रौ पूर्वपश्चिमौ।<br>हिमप्रायश्च हिमवान् हेमकूटश्च हेमवान्॥ ११<br>सर्वतः सुमुखश्चापि निषधः पर्वतो महान्। | है; उन पर्वतोंसे निकलनेवाली नदियोंसे यह चारों ओरसे व्याप्त है। इसमें पूर्वसे पश्चिम तक फैले हुए अत्यन्त विस्तृत छः वर्षपर्वत हैं। इसमें पूर्व और पश्चिम—दोनों ओरके समुद्रोंतक फैला हुआ हिमवान् नामक पर्वत है, जो सदा बर्फसे ढका रहता है। इसके बाद सुवर्णसे व्याप्त हेमकूट नामक पर्वत है। तत्पश्चात् जो चारों ओरसे देखनेमें अत्यन्त सुन्दर है, वह निषध नामक महान् पर्वत है॥४—११½॥ |
| चातुर्वर्ण्यस्तु सौवर्णो मेरुश्चोल्बममयः स्मृतः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णं च चतुर्दिशम्॥ १२<br>वृत्ताकृतिप्रमाणश्च चतुरस्रः समाहितः।<br>नानावर्णैः समः पाश्र्वैः प्रजापतिगुणान्वितः॥ १३<br>नाभीबन्धनसम्भूतो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः।<br>पूर्वतः श्वेतवर्णस्तु ब्राह्मण्यं तस्य तेन वै॥ १४<br>पीतश्च दक्षिणेनासौ तेन वैश्यत्वमिष्यते।<br>भृङ्गिपत्रनिभश्चैव पश्चिमेन समन्वितः।<br>तेनास्य शूद्रता सिद्धा मेरोनामार्थकर्मतः॥ १५<br>पाश्र्वमुत्तरतस्तस्य रक्तवर्णं स्वभावतः।<br>तेनास्य क्षत्रभावः स्यादिति वर्णाः प्रकीर्तिताः॥ १६<br>नीलश्च वैदूर्यमयः श्वेतः पीतो हिरण्मयः।<br>मयूरबर्हवर्णश्च शातकौम्भः स शृङ्गवान्॥ १७<br>एते पर्वतराजानः सिद्धचारणसेविताः।<br>तेषामन्तरविष्कम्भो नवसाहस्रमुच्यते॥ १८ | इसके एक ओर सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसके चारों पार्श्वभाग चार रंगोंके हैं और जो उल्बममय (गर्भाशयके समान) कहा जाता है। यह चारों दिशाओंमें चौबीस हजार योजनोंतक फैला हुआ है। इसका ऊपरी भाग वृत्तकी आकृतिका अर्थात् गोलाकार है तथा निचला भाग चौकोर है। इसके पार्श्वभाग नाना प्रकारकी रंग-बिरंगी समतल भूमियोंसे युक्त हैं, जिससे प्रजापतिके गुणोंसे युक्त-सा दीखता है। यह अव्यक्तजन्मा ब्रह्माके नाभि-बन्धनसे उद्भूत हुआ है। इसका पूर्वी भाग श्वेत रंगका है, इसीसे इसकी ब्राह्मणता झलकती है। इसका दक्षिणी भाग पीले रंगका है, इसीसे इसमें वैश्यत्वकी प्रतीति होती है। इसका पश्चिमी भाग भौंरेके पंख-सरीखा काला है, इसीसे इसकी शूद्रता तथा अर्थ और काम—दोनों दृष्टियोंसे मेरुके नामकी सार्थकता सिद्ध होती है। इसका उत्तरी भाग स्वभावसे ही लाल रंगका है, इसीसे इसका क्षत्रियत्व सूचित होता है। इस प्रकार मेरुके चारों रंगोंका विवरण बतलाया गया है। तदनन्तर नील पर्वत है, जो वैदूर्यमणिसे व्याप्त है। पुनः श्वेत पर्वत है, जो सुवर्णमय होनेके कारण पीले रंगका है तथा सुवर्णमय शिखरोंसे सुशोभित शृङ्गवान् पर्वत है, जो मयूर-पिच्छ-सरीखे चित्र-विचित्र रंगोंवाला है। ये सभी पर्वतराज सदा सिद्धों एवं चारणोंसे सेवित होते रहते हैं। उनका भीतरी व्यास नौ हजार योजन बतलाया जाता है॥१२—१८॥ |
| मध्ये त्विलावृतं नाम महामेरोः समंततः।<br>चतुर्विंशत्सहस्राणि विस्तीर्णो योजनैः समः॥ १९<br>मध्ये तस्य महामेरुर्विधूम इव पावकः।<br>वेद्यर्धं दक्षिणं मेरोरुत्तरार्धं तथोत्तरम्॥ २०<br>वर्षाणि यानि सप्तात्र तेषां वै वर्षपर्वताः।<br>द्वे द्वे सहस्त्रे विस्तीर्णा योजनैर्दक्षिणोत्तरम्॥ २१<br>जम्बूद्वीपस्य विस्तारस्तेषामायाम उच्यते।<br>नीलश्च निषधश्चैव तेषां हीनाश्च ये परे॥ २२ | पृथ्वीके मध्य भागमें इलावृत नामक वर्ष है, जो महामेरु पर्वतके चारों ओर फैला हुआ है। यह चौबीस हजार योजनकी समतल भूमिमें विस्तृत है। इसके मध्य भागमें महामेरु नामक पर्वत है, जो धूमरहित अग्निके समान चमकता रहता है। मेरु पर्वतका आधा दक्षिणी भाग दक्षिण मेरु और आधा उत्तरी भाग उत्तर मेरुके नामसे प्रसिद्ध है। इस प्रकार जो सात वर्ष बतलाये गये हैं, उनमें पृथक्-पृथक् सात वर्षपर्वत हैं, जो दक्षिणसे उत्तरतक दो-दो हजार योजनके परिमाणमें फैले हुए हैं। जम्बूद्वीपका विस्तार इन्हीं वर्षों तथा पर्वतोंके विस्तारके बराबर कहा जाता है। इनमें नील और निषध—ये दोनों विशाल पर्वत हैं |