मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ११३ * ३७१
| श्वेतश्च हेमकूटश्च हिमवाञ्छृङ्गवांश्च यः।<br>जम्बूद्वीपप्रमाणेन ऋषभः परिकीर्त्यते॥ २३<br>तस्माद् द्वादशभागेन हेमकूटोऽपि हीयते।<br>हिमवान् विंशभागेन तस्मादेव प्रहीयते।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि हेमकूटो महागिरिः॥ २४<br>अशीतिर्हिमवाञ्छैल आयतः पूर्वपश्चिमे।<br>द्वीपस्य मण्डलीभावाद् ह्रासवृद्धी प्रकीर्तिते॥ २५<br>वर्षाणां पर्वतानां च यथाभेदं तथोत्तरम्।<br>तेषां मध्ये जनपदास्तानि वर्षाणि सप्त वै॥ २६<br>प्रपातविषमैस्तैस्तु पर्वतैरावृतानि तु।<br>सप्त तानि नदीभेदैरगम्यानि परस्परम्॥ २७<br>वसन्ति तेषु सत्त्वानि नानाजातीनि सर्वशः।<br>इदं हैमवतं वर्षं भारतं नाम विश्रुतम्॥ २८ | तथा श्वेत, हेमकूट, हिमवान् और शृङ्गवान्—ये अपेक्षाकृत उनसे छोटे हैं। ऋषभ पर्वत जम्बूद्वीपके समान ही विस्तारवाला बतलाया जाता है। हेमकूट पर्वत ऋषभ पर्वतके बारहवें भागसे न्यून है और हिमवान् उसके बीसवें अंशसे कम है। हेमकूट नामक महान् पर्वत अठासी हजार योजनके परिमाणवाला कहा जाता है तथा हिमवान् पर्वत पूर्वसे पश्चिमतक अस्सी हजार योजनमें फैला हुआ है। जम्बूद्वीपके मण्डलाकारमें स्थित होनेके कारण इन पर्वतोंका न्यूनाधिक्य बतलाया गया है। पर्वतोंकी ही भाँति वर्षोमें भी भिन्नता है। वे सभी एक-दूसरेसे उत्तर दिशाकी ओर फैले हुए हैं। इनके बीचमें देश बसे हुए हैं, जो सात वर्षोंमें विभक्त हैं। ये सभी वर्ष ऐसे पर्वतोंसे घिरे हुए हैं, जो झरनोंके कारण अगम्य हैं। इसी प्रकार सात नदियोंके विभाजनसे ये परस्पर गमनागमनरहित हैं। इन वर्षोंमें सब ओर अनेकों जातियोंके प्राणी निवास करते हैं। यह हिमवान् पर्वतसे सम्बन्धित वर्ष भारतवर्षके नामसे विख्यात है॥ १९—२८॥ | | हेमकूटं परं तस्मान्नाम्ना किम्पुरुषं स्मृतम्।<br>हेमकूटाच्च निषधं हरिवर्षं तदुच्यते॥ २९<br>हरिवर्षात् परं चापि मेरोस्तु तदिलावृतम्।<br>इलावृतात्परं नीलं रम्यकं नाम विश्रुतम्॥ ३०<br>रम्यकादपरं श्वेतं विश्रुतं तद्धिरण्मयकम्।<br>हिरण्यकात् परं चैव शृङ्गशाकं कुरुं स्मृतम्॥ ३१<br>धनुःसंस्थे तु विज्ञेये देवर्षे दक्षिणोत्तरे।<br>दीर्घाणि तस्य चत्वारि मध्यमं तदिलावृतम्॥ ३२<br>पूर्वतो निषधस्येदं वेद्यर्धं दक्षिणं स्मृतम्।<br>परं त्विलावृतं पश्चाद् वेद्यर्धं तु तदुत्तरम्॥ ३३<br>तयोर्मध्ये तु विज्ञेयो मेरुर्यत्र त्विलावृतम्।<br>दक्षिणेन तु नीलस्य निषधस्योत्तरेण तु॥ ३४<br>उद्गायतो महाशैलो माल्यवान् नाम पर्वतः।<br>द्वात्रिंशता सहस्रेण प्रतीच्यां सागरानुगः॥ ३५<br>माल्यवान् वै सहस्रैक आनीलनिषधायतः।<br>द्वात्रिंशत् त्वेवमप्युक्तः पर्वतो गन्धमादनः॥ ३६ | हिमवान्के बाद हेमकूटतकका प्रदेश किम्पुरुष नामसे कहा जाता है तथा हेमकूटसे आगे निषध पर्वततक हरिवर्ष कहलाता है। हरिवर्षके बाद मेरुपर्वततकका प्रदेश इलावृतवर्षके नामसे तथा इलावृतके बाद नीलपर्वततकका प्रदेश रम्यकवर्षके नामसे विख्यात है। रम्यकवर्षके बाद श्वेतपर्वततकका जो प्रदेश है, वह हिरण्यकवर्षके नामसे प्रसिद्ध है। हिरण्यकवर्षके बाद शृङ्गशाक नामक वर्ष है, जिसे कुरुवर्ष भी कहते हैं। मेरुपर्वतके दक्षिण और उत्तर दिशामें धनुषके आकारमें दो वर्ष स्थित हैं। उन्हींके मध्यमें इलावृतवर्ष है। निषध पर्वतके पूर्व दिशामें मेरुकी वेदीका अर्धभाग दक्षिणवेदी और इलावृतसे पश्चिमकी ओर वेदीका आधा भाग उत्तरवेदीके नामसे विख्यात है। इन्हीं दोनोंके बीचमें मेरुकी स्थिति समझनी चाहिये, जहाँ इलावृतवर्ष अवस्थित है। नील पर्वतके दक्षिण और निषध पर्वतके उत्तर माल्यवान् नामक पर्वत है, जिसकी गणना विशाल पर्वतोंमें है। यह उत्तरसे दक्षिणकी ओर लम्बा है। यह पश्चिम दिशामें सागरपर्यन्त बत्तीस हजार योजनमें फैला हुआ है। इस प्रकार माल्यवान् पर्वत नील और निषध पर्वतोंके बीचमें एक हजार योजनके विस्तारमें स्थित है। इसी तरह गन्धमादन पर्वत भी बत्तीस हजार |