भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 403
* अध्याय ११६ *३९३
तस्यास्तीरभवा वृक्षाः सुगन्धकुसुमाचिताः।<br>तथापकृष्टसम्भ्रान्तभ्रमरस्तनिताकुलाः ॥ १७<br>यस्यास्तीरे रतिं यान्ति सदा कामवशा मृगाः।<br>तपोवनाश्च ऋषयस्तथा देवाः सहाप्सराः॥ १८<br>लभन्ते यत्र पूताङ्गा देवेभ्यः प्रतिमानिताः।<br>स्त्रियश्च नाकबहुलाः पद्मेन्दुप्रतिमाननाः॥ १९<br>या बिभर्त्ति सदा तोयं देवसङ्गैरपीडितम्।<br>पुलिन्दैर्नृपसङ्घैश्च व्याघ्रवृन्दैरपीडितम्॥ २०<br>सतामरसपानीयां सतारगगनामलाम्।<br>स तां पश्यन् ययौ राजा सतामीप्सितकामदाम्॥ २१<br>यस्यास्तीररुहैः काशैः पूर्णैश्चन्द्रांशुसंनिभैः।<br>राजते विविधाकारै रम्यं तीरं महाद्रुमैः।<br>या सदा विविधैर्विप्रैर्देवैश्चापि निषेव्यते॥ २२<br>या च सदा सकलौघविनाशं<br>भक्तजनस्य करोत्यचिरेण।<br>यानुगता सरितां हि कदम्बै-<br>र्ह्यनुगता सततं हि मुनीन्द्रैः॥ २३<br>या हि सुतानिव पाति मनुष्यान्<br>या च युता सततं हिमसङ्घैः।<br>या च युता सततं सुरवृन्दै-<br>र्या च जनैः स्वहिताय श्रिता वै॥ २४<br>युक्ता च केसरिगणैः करिवृन्दजुष्टा<br>संतानयुक्तसलिलापि सुवर्णयुक्ता।<br>सूर्यांशुतापपरिवृद्धकदम्बवृक्षा<br>शीतांशुतुल्ययशसा ददृशे नृपेण॥ २५चन्दनोंने युक्त था, जिसपर भौरे मँडरा रहे थे। उसके तटपर उगे हुए वृक्ष सुगन्धित पुष्पोंसे लदे हुए तथा सुगन्धके लोभसे आकृष्ट हुए चञ्चल भौरोंकी गुंजारसे व्याप्त थे। जिसके तटपर कामके वशीभूत हुए मृग हिरनियोंके साथ विहार करते थे तथा वहाँ तपोवन, ऋषिगण, अप्सराओंसमेत देवगण, देवताओंके समान सुन्दर एवं पवित्र अङ्गोंवाले अन्य पुरुष एवं कमल और चन्द्रमाकी-सी मुखवाली स्वर्गवासिनी स्त्रियाँ भी पायी जाती थीं, जो देवगणों, पुलिन्दों (जंगली जातियों), नृपसमूहों और व्याघ्रदलोंसे अपीडित अर्थात् परम पवित्र जल धारण करती थी, जो कमलयुक्त जल धारण करनेके कारण तारिकाओंसहित निर्मल आकाशके समान सुशोभित तथा सत्पुरुषोंकी अभीष्ट कामनाओंको पूर्ण करनेवाली थी, उसे देखते हुए राजा पुरूरवा आगे बढ़े। जिस नदीके रमणीय तट तीरभूमिमें उगे हुए पूर्णिमाके चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल काश-पुष्पों तथा अनेकों प्रकारके विशाल वृक्षोंसे सुशोभित थे, जो सदा विविध मतावलम्बी ब्राह्मणों और देवताओंसे सुसेवित थी, जो सदा भक्तजनोंके सम्पूर्ण पापोंका शीघ्र ही विनाश कर देती थी, जिसमें बहुत-सी छोटी-छोटी नदियाँ आकर मिली थीं, जो निरन्तर मुनीश्वरोंद्वारा सेवित थी, जो पुत्रकी तरह मनुष्योंका पालन करती थी, जो सदा हिम (बर्फ) राशिसे आच्छादित रहती थी, जो निरन्तर देवगणोंसे संयुक्त रहती थी, अपना कल्याण करनेके लिये मनुष्य जिसका आश्रय लेते थे, जिसके किनारे झुंड-के-झुंड सिंह घूमते रहते थे, जो हाथी-समूहोंसे सेवित थी, जिसका जल कल्पवृक्षके पुष्पोंसे युक्त और सुवर्णके समान चमकीला था तथा जिसके तटवर्ती कदम्ब-वृक्ष सूर्यकी किरणोंके तापसे बढ़े हुए थे—ऐसी ऐरावती नदीको चन्द्रमा-सरीखे निर्मल यशवाले राजा पुरूरवाने देखा॥ १३-२५॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे भुवनकोषे सुरनदीवर्णनं नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११६॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनप्रसंगमें सुरनदी-वर्णन नामक एक सौ सोलहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११६॥