भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 404

३९४ * मत्स्यपुराण *


एक सौ सत्रहवाँ अध्याय

हिमालयकी अद्भुत छटाका वर्णन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
आलोकयन् नदीं पुण्यां तत्समीरहृतश्रमः ।<br>स गच्छन्नेव ददृशे हिमवन्तं महागिरिम् ॥ १<br><br>खमुल्लिखद्भिर्बहुभिर्वृतं शृङ्गैस्तु पाण्डुरैः ।<br>पक्षिणामपि सञ्चारैर्विना सिद्धगतिं शुभाम् ॥ २<br><br>नदीप्रवाहसञ्जातमहाशब्दैः समन्ततः ।<br>असंश्रुतान्यशब्दं तं शीततोयं मनोरमम् ॥ ३<br><br>देवदारुवने नीलैः कृताधोवसनं शुभम् ।<br>मेघोत्तरीयकं शैलं ददृशे स नराधिपः ॥ ४<br><br>श्वेतमेघकृतोष्णीषं चन्द्रार्कमुकुटं क्वचित् ।<br>हिमानुलिप्तसर्वाङ्गं क्वचिद् धातुविमिश्रितम् ॥ ५<br><br>चन्दनेनानुलिप्ताङ्गं दत्तपञ्चाङ्गुलं यथा ।<br>शीतप्रदं निदाघेऽपि शिलाविकटसङ्कटम् ।<br>सालक्तकैरप्सरसां मुद्रितं चरणैः क्वचित् ॥ ६<br><br>क्वचित् संस्पृष्टसूर्यांशुं क्वचिच्च तमसावृतम् ।<br>दरीमुखैः क्वचिद् भीमैः पिबन्तं सलिलं महत् ॥ ७<br><br>क्वचिद् विद्याधरगणैः क्रीडद्भिरुपशोभितम् ।<br>उपगीतं तथा मुख्यैः किन्नराणां गणैः क्वचित् ॥ ८<br><br>आपानभूमौ गलितैर्गन्धर्वाप्सरसां क्वचित् ।<br>पुष्पैः संतानकादीनां दिव्यैस्तमुपशोभितम् ॥ ९<br><br>सुमोत्थिताभिः शय्याभिः कुसुमानां तथा क्वचित् ।<br>मृदिताभिः समाकीर्णं गन्धर्वाणां मनोरमम् ॥ १०<br><br>निरुद्धपवनैर्देशैर्नीलशाद्वलमण्डितैः ।<br>क्वचिच्च कुसुमैर्युक्तमत्यन्तरुचिरं शुभम् ॥ ११ऋषियो! ऐरावती नदीके जलका स्पर्श करके बहती हुई वायुके स्पर्शसे राजा पुरूरवाकी थकावट दूर हो गयी थी। वे उस पुण्यमयी नदीको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। इतनेमें उन्हें महान् पर्वत हिमवान् दृष्टिगोचर हुआ। वह बहुत-से पीलापन लिये हुए उज्ज्वल वर्णवाले गगनचुम्बी शिखरोंसे युक्त था। वहाँ मङ्गलमयी सिद्ध-गतिके बिना पक्षियोंका भी संचार कठिन था अर्थात् वहाँ केवल सिद्धलोग ही जा सकते थे। वहाँ नदियोंके प्रवाहसे उत्पन्न हुआ महान् घर्घर शब्द चारों ओर गूँज रहा था, जिसके कारण दूसरा कोई शब्द सुनायी ही नहीं पड़ता था। वह शीतल जलसे परिपूर्ण एवं अत्यन्त मनोरम था। उसने देवदारुके नीले वनोंको अधोवस्त्रके स्थानपर और मेघोंको उत्तरीय वस्त्रके रूपमें धारण कर रखा था। ऐसे हिमालय पर्वतको राजा पुरूरवाने देखा। उसने कहीं तो श्वेत बादलोंकी पगड़ी बाँध रखी थी और कहीं सूर्य एवं चन्द्रमा उसके मुकुट-सरीखे दीख रहे थे। उसका सारा अङ्ग तो बर्फसे आच्छादित था, किंतु उसमें कहीं-कहीं गेरू आदि धातुएँ भी मिली हुई थीं, जिससे वह ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो श्वेत चन्दनसे लिपटे हुए शरीरपर पाँचों अङ्गुलियोंकी छाप लगा दी गयी हो। वह ग्रीष्म-ऋतुमें भी शीतलता प्रदान कर रहा था तथा बड़ी-बड़ी शिलाओंसे युक्त होनेके कारण अगम्य था। कहीं-कहीं अप्सराओंके महावरयुक्त चरणोंसे चिह्नित था, कहीं तो सूर्यकी किरणोंका स्पर्श हो रहा था, किंतु कहीं घोर अन्धकारसे आच्छादित था, कहीं भयानक गुफाओंके मुखोंमें जल गिर रहा था, जो ऐसा लगता था मानो वह अधिक-से-अधिक जल पी रहा हो। कहीं क्रीडा करते हुए यूथ-के-यूथ विद्याधरोंसे सुशोभित था, कहीं किंनरोंके प्रधान गणोंद्वारा गान हो रहा था, कहीं गन्धर्वों एवं अप्सराओंकी आपानभूमि (मधुशाला)-में गिरे हुए कल्पवृक्ष आदि वृक्षोंके दिव्य पुष्पोंसे सुशोभित था और कहीं गन्धर्वोंकी शयन करके उठ जानेके पश्चात् मर्दित हुई शय्याओंके बिखरे हुए पुष्पोंसे आच्छादित होनेके कारण अत्यन्त मनोरम लग रहा था। कहीं ऐसे प्रदेश थे, जहाँ वायुकी पहुँच नहीं थी, किंतु वे हरी घासोंसे सुशोभित थे तथा उनपर फूल बिखरे हुए थे, जिससे वह अत्यन्त रुचिर एवं सुन्दर लग रहा था॥ १—११॥