भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 405
* अध्याय ११७ *३९५

| तपस्विशरणं शैलं कामिनामतिदुर्लभम्।<br>मृगैर्यथानुचरितं दन्तिभिन्नमहाद्रुमम्॥ १२<br>यत्र सिंहनिनादेन त्रस्तानां भैरवं रवम्।<br>दृश्यते न च संश्रान्तं गजानामाकुलं कुलम्॥ १३<br>तटाश्च तापसैर्यत्र कुञ्जदेशैरलङ्कृताः।<br>रत्नैर्यस्य समुत्पन्नैस्त्रैलोक्यं समलङ्कृतम्॥ १४<br>अहीनशरणं नित्यमहीनजनसेवितम्।<br>अहीनः पश्यति गिरिमहीनं रत्नसम्पदा॥ १५<br>अल्पेन तपसा यत्र सिद्धिं प्राप्स्यन्ति तापसाः।<br>यस्य दर्शनमात्रेण सर्वकल्मषनाशनम्॥ १६<br>महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभिः ।<br>वायुनीतैः सदा तृप्तिकृतदेशं क्वचित् क्वचित्॥ १७<br>समालब्धजलैः शृङ्गैः क्वचिच्चापि समुच्छ्रितैः।<br>नित्यार्कतापविषमैरगम्यैर्मनसा युतम्॥ १८<br>देवदारुमहावृक्षव्रजशाखानिरन्तरैः ।<br>वंशस्तम्बवनाकारैः प्रदेशैरुपशोभितम्॥ १९<br>हिमच्छत्रमहाशृङ्गं प्रपातशतनिर्झरम्।<br>शब्दलभ्याम्बुविषमं हिमसंरुद्धकन्दरम्॥ २०<br>दृष्ट्वैव तं चारुनितम्बभूमिं<br>महानुभावः स तु मद्रनाथः।<br>बभ्राम तत्रैव मुदा समेतः<br>स्थानं तदा किंचिदथाससाद॥ २१ | वह पर्वत तपस्वियोंका आश्रयस्थान तथा कामीजनोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ था, उसपर मृग आदि वन्य पशु स्वच्छन्द विचरण करते थे, उसके विशाल वृक्षोंको हाथियोंने भिन्न-भिन्न कर दिया था, जहाँ सिंहकी गर्जनासे भयभीत हुए हाथियोंके दल व्याकुल होकर भयंकर चिग्घाड़ कर रहे थे, जिससे उनमें शान्ति नहीं दीख रही थी, जिसके तटवर्ती प्रदेश निकुञ्जों और तपस्वियोंसे अलंकृत थे, जिससे उत्पन्न हुए रत्नोंसे त्रिलोकी अलंकृत होती है, वासुकि आदि बड़े-बड़े नागोंके आश्रयस्थान, सत्पुरुषोंद्वारा सेवित तथा रत्नसम्पत्तियोंसे परिपूर्ण उस पर्वतको कोई सत्पुरुष ही देख सकता है। जहाँ तपस्वीलोग थोड़े ही तपसे सिद्धि प्राप्त कर लेते हैं, जिसके दर्शनमात्रसे सारा पाप नष्ट हो जाता है, जिसके किन्हीं-किन्हीं स्थलोंपर वायुद्वारा लाये गये बड़े-बड़े झरनोंके गिरनेसे उत्पन्न हुए छोटे-छोटे झरनोंके जलसे पर्वतीय प्रदेश तृप्त होते हैं। कहीं उसके ऊँचे-ऊँचे शिखर जलसे आप्लावित थे तथा कहीं सूर्यके तापसे संतप्त होनेके कारण अगम्य थे। वहाँ केवल मनसे ही जाया जा सकता था; जो कहीं-कहीं देवदारुके विशाल वृक्षोंकी शाखा-प्रशाखाओंसे घनीभूत हुए तथा कहीं बाँसोंकी झुरमुटरूपी वनोंके आकारसे युक्त प्रदेशोंसे सुशोभित था। कहीं छत्तेके समान बड़े-बड़े शिखर बर्फसे आच्छादित थे, कहीं सैकड़ों झरने झर रहे थे, कहीं जलके गिरनेसे उत्पन्न हुए शब्दोंसे ही जलकी प्रतीति होती थी, कहीं गुफाएँ बर्फसे ढकी हुई थीं। इस प्रकार सुन्दर नितम्बरूपी भूमिसे युक्त उस हिमालय पर्वतको देखकर महानुभाव मद्रेश्वर पुरूरवा हर्षपूर्वक वहीं (अपने मनोऽनुकूल स्थानकी खोज करते हुए) घूमने लगे। तब उन्हें एक स्थान प्राप्त हुआ॥ १२–२१॥ |


इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोषे हिमवद्वर्णनं नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोष-वर्णनमें हिमवद् वर्णन नामक एक सौ सत्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११७ ॥