मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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एक सौ अठारहवाँ अध्याय
हिमालयकी अनोखी शोभा तथा अत्रि-आश्रमका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! दैवयोगसे महाराज पुरूरवा उसी पर्वतराजके परम सुरम्य प्रदेशमें पहुँच गये, जो अन्य मनुष्योंके लिये अगम्य था। जहाँसे नदियोंमें श्रेष्ठ ऐरावती निकली हुई थी, वह देश मेघके समान श्यामल था तथा अनेकों प्रकारके वृक्षसमूहोंसे घिरा हुआ था। वहाँ शाल (साखू), ताल (ताड़), तमाल, कर्णिकार (कनेर), शामल (सेमल), न्यग्रोध (बरगद), अश्वत्थ (पीपल), शिरीष (सिरसा), शिंशपा (सीसम), श्लेष्मातक (लहसोढ़ा), आमलक (आमला), हरीतकी (हर्रे), बिभीतक (बहेड़ा), भूर्ज (भोजपत्र), मुञ्जक (मूँज), बाणवृक्ष (साखूका एक भेद), सप्तच्छद (छितवन), महानिम्ब (बकाइन), नीम, निर्गुण्डी (सिंदुवार या शेफाली), हरिद्रुम (दारु हल्दी), विशाल वृक्ष देवदारु, कालेयक (अगर), पद्मक (पद्माख), चन्दन, बेल, कैथ, लाल चन्दन, आम्रात (एकलता), अरिष्टक (रीठा), अक्षोट (पीलू या अखरोट), अब्दक (नागरमोथा), अर्जुन, सुन्दर पुष्पोंवाले हस्तिकर्ण (पलाश), खिले हुए फूलोंसे युक्त कोविदार (कचनार), प्राचीनामलक (पुराने आमलकके वृक्ष) धनक (धनेश), मराटक (बाजरा), खजूर, नारियल, प्रियाल (पियार, इसके फलोंकी गिरी चिरौंजी होती है), आम्रातक (आमड़ा), इङ्गुद (हिंगोट), तन्तुमाल (पटुआ), सुन्दर धवके वृक्ष, काश्मीरी, शालपर्णी, जातीफल (जायफल), पूगफल (सुपारी), कटुफल (कायफर), इलायचीकी लताओंके फल, मन्दार, कोविदार (कचनार), किंशुक (पलाश), कुसुमांशुक (एक प्रकारका अशोक), यवास (जवासा), शमी, तुलसी, बेंत, जलमें उगनेवाले बेंत, हल्के तथा गाढ़े लाल रंगवाले नारंगीके वृक्ष, हिंगु और प्रियङ्गु (बड़ी पीपर)-के वृक्ष भरे पड़े थे॥ १–१०॥ <br><br> साथ ही लाल अशोक, अशोक, आकल्ल (अकरकरा), अविचारक, मुचुकुन्द, कुन्द, आटरूष (अडूसा), परूषक (फालसा), किरात (चिरायता), किंकिरात (बबूल), केतकी, सफेद केतकी, शोभाञ्जन (सहिजन), अञ्जन, कलिंग (सिरसा), निकोटक (अंकोल), सुवर्णके-से चमकीले सुन्दर वल्कलसे युक्त विजयसालके वृक्ष, असना, कामदेवके बाणोंके-से आकारवाले सुन्दर आमके वृक्ष, | | तस्यैव पर्वतेन्द्रस्य प्रदेशं सुमनोरमम्। <br> अगम्यं मानुषैरन्यैर्दैवयोगादुपागतः॥ १ | | | ऐरावती सरिच्छ्रेष्ठा यस्माद् देशाद् विनिर्गता। <br> मेघश्यामं च तं देशं द्रुमषण्डैरनेकशः॥ २ | | | शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैः सशामलैः। <br> न्यग्रोधैश्च तथाश्वत्थैः शिरीषैः शिंशपाद्रुमैः॥ ३ | | | श्लेष्मातकैरामलकैर्हरीतकविभीतकैः । <br> भूर्जैः समुञ्जकैर्बाणैर्वृक्षैः सप्तच्छद्रुमैः॥ ४ | | | महानिम्बैस्तथा निम्बैर्निर्गुण्डीभिर्हरिद्रुमैः। <br> देवदारुमहावृक्षैस्तथा कालेयकद्रुमैः॥ ५ | | | पद्मकैश्चन्दनैर्बिल्वैः कपित्थै रक्तचन्दनैः। <br> आम्रातारिष्टकाक्षोटैरब्दकैश्च तथार्जुनैः॥ ६ | | | हस्तिकर्णैः सुमनसैः कोविदारैः सुपुष्पितैः। <br> प्राचीनामलकैश्चापि धनकैः समराटकैः॥ ७ | | | खर्जूरैर्नारिकेलैश्च प्रियालाम्रातकेङ्गुदैः। <br> तन्तुमालैर्धवैर्भव्यैः काश्मीरीपर्णिभिस्तथा॥ ८ | | | जातीफलैः पूगफलैः कटुफलैर्लाविलीफलैः। <br> मन्दारैः कोविदारैश्च किंशुकैः कुसुमांशुकैः॥ ९ | | | यवासैः शमिपर्णासैर्वेतसैरम्बुवेतसैः। <br> रक्तातिरङ्गनारङ्गैर्हिङ्गुभिः सप्रियङ्गुभिः॥ १० | | | रक्ताशोकैस्तथाशोकैराकल्लैर्विचारकैः । <br> मुचुकुन्दैस्तथा कुन्दैराटरूषपरूषकैः॥ ११ | | | किरातैः किंकिरातैश्च केतकैः श्वेतकेतकैः। <br> शोभाञ्जनैरञ्जनैश्च सुकलिङ्गनिकोटकैः॥ १२ | | | सुवर्णचारुवसनैर्द्रुमश्रेष्ठैस्तथासनैः । <br> मन्मथस्य शराकारैः सहकारैर्मनोरमैः॥ १३ | |