भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४००* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
श्वापदान् विविधाकारान् मृगांश्चैव महामृगान्।<br>व्याघ्रान् केसरिणः सिंहान्द्वीपिनः शरभान्वृकान्॥ ५६<br>ऋक्षांस्तरक्षूंश्च बहून् गोलाङ्गूलान् सवानरान्।<br>शशलोमान् सकादम्बान् मार्जारान् वायुवेगिनः॥ ५७<br>तथा मत्तांश्च मातङ्गान्महिषान् गवयान् वृषान्।<br>चमरान् सुमरांश्चैव तथा गौरखरानपि॥ ५८<br>उरभ्रांश्च तथा मेषान् सारङ्गानथ कूकुरान्।<br>नीलांश्चैव महानीलान् करालाञ् मृगमातृकान्॥ ५९<br>सदंष्ट्रालोमशरभान् क्रौञ्चाकारकशम्बरान्।<br>करालान् कृतमालांश्च कालपुच्छांश्च तोरणान्॥ ६०<br>उष्ट्रान् खड्गान् वराहांश्च तुरङ्गान् खरगर्दभान्।<br>एतानद्विष्टान् मद्रेशो विरुद्धांश्च परस्परम्॥ ६१<br>अविरुद्धान् वने दृष्ट्वा विस्मयं परमं ययौ।<br>तच्चाश्रमपदं पुण्यं बभूवात्रेः पुरा नृप॥ ६२<br>तत्प्रसादात् प्रभावयुक्तं स्थावरैर्जङ्गमैस्तथा।<br>हिंसन्ति हि न चान्योन्यं हिंसकास्तु परस्परम्॥ ६३इसी प्रकार राजाको वहाँ विभिन्न रूप-रंगवाले जंगली जीव भी देखनेको मिले। जैसे—हिरन, बारहसिंगे, बाघ, सिंह, शेर, चीता, शरभ (अष्टपदी), भेड़िया, रीछ, तरक्षु (लकड़ा), बहुत-से लाङ्गूली वानर, सामान्य वानर, वायु-सरीखे वेगशाली खरगोश, लोमड़ी, वनबिलाव, बिलाव, मतवाले हाथी, भैंसे, नीलगाय, बैल, चमर (सुरा गाय), सुमर (बालमृग), श्वेत रंगके गधे, भेड़, मेढ़, मृग, कुत्ते, नीले एवं गाढ़े नीले रंगवाले भयानक मृगमातृक (कस्तूरी मृग), बड़ी-बड़ी दाढ़ों एवं रोमोंसे युक्त शरभ (अष्टपदी), क्रौंच पक्षीके आकारवाले शम्बर (साबर मृग), भयानक कृतमाल (एक प्रकारका हिरन), काली पूँछोंवाले तोरण (सियार), ऊँट, गैंड़े, सूअर, घोड़े, खच्चर, गधे* आदि जीवोंको उस वनमें परस्पर विरुद्धस्वभाववाले होनेपर भी द्वेषरहित होकर निवास करते देखकर मद्रेश्वर पुरूरवा विस्मयविमुग्ध हो गये। राजन्! पूर्वकालमें उसी स्थानपर महर्षि अत्रिका पुण्यमय आश्रम था। उन ऋषिकी कृपासे वह प्रदेश स्थावर-जङ्गम प्राणियोंसे भरा हुआ अत्यन्त सुहावना था और वहाँ हिंसक जीव भी परस्पर एक-दूसरेकी हिंसा नहीं करते थे॥ ५६-६३॥
क्रव्यादाः प्राणिनस्तत्र सर्वे क्षीरफलाशनाः।<br>निर्मितास्तत्र चात्यर्थमत्रिणा सुमहात्मना॥ ६४<br>शैलनितम्बदेशेषु न्यवसच्च स्वयं नृपः।<br>पयः क्षरन्ति ते दिव्यममृतस्वादु ह्यकण्टकम्॥ ६५<br>क्वचिद् राजन् महिष्यश्च क्वचिदाजाश्च सर्वशः।<br>शिलाः क्षीरेण सम्पूर्णा दध्ना चान्यत्र वा बहिः॥ ६६<br>सम्पश्यन् परमां प्रीतिमवाप वसुधाधिपः।<br>सरांसि तत्र दिव्यानि नद्यश्च विमलोदकाः॥ ६७<br>प्रणालिकानि चोष्णानि शीतलानि च भागशः।<br>कन्दराणि च शैलस्य सुसेव्यानि पदे पदे॥ ६८<br>हिमपातो न तत्रास्ति समन्तात् पञ्चयोजनम्।<br>उपत्यका सुशैलस्य शिखरस्य न विद्यते॥ ६९<br>तत्रास्ति राजञ्छिखरं पर्वतेन्द्रस्य पाण्डुरम्।<br>हिमपातं घना यत्र कुर्वन्ति सहिताः सदा॥ ७०महर्षि अत्रिने उस आश्रममें ऐसा उत्तम वातावरण बना दिया था कि वहाँके सभी मांसभोजी जीव दूध और फलका ही आहार करते थे। राजन्! मद्रेश्वरने पर्वतके उसी नितम्बप्रदेश (निचले भाग)-में अपना निवास-स्थान बनाया। वहाँ सब ओर कहीं भैंसों तो कहीं बकरियोंके स्तनोंसे अमृतके समान स्वादिष्ट दिव्य दूध झरता रहता था, जिससे वहाँकी शिलाएँ भीतर-बाहर—सब ओर दूध एवं दहीसे सराबोर रहती थीं। यह देखकर भूपाल पुरूरवाको परम हर्ष प्राप्त हुआ। वहाँ दिव्य सरोवर थे तथा निर्मल जलसे भरी हुई नदियाँ बह रही थीं। नालियोंमें कहीं गरम तो कहीं शीतल जल बह रहा था। उस पर्वतकी कन्दराएँ पग-पगपर सेवन करने योग्य थीं। उस आश्रमके चारों ओर पाँच योजनके घेरेमें हिम-पात नहीं होता था। उस सुन्दर पर्वतके शिखरके नीचे उपत्यका (मैदानी भूमि) नहीं थी (जिसके कारण वह प्रदेश जनशून्य था)। राजन्! वहाँ उस पर्वतराजका एक पीले रंगका शिखर है, जिसपर बादल संगठित होकर सदा हिमकी वर्षा किया

* नामावलिमें एक ही नाम कई बार आये हैं, अतः उनसे उस जातिके विभिन्न भेदोंको समझना चाहिये।