भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ११९ *४०१
तत्रास्ति चापरं शृङ्गं यत्र तोयघना घनाः।<br>नित्यमेवाभिवर्षन्ति शिलाभिः शिखरं वरम्॥ ७१<br>तदाश्रमं मनोहारि यत्र कामधरा धरा।<br>सुरमुख्योपयोगित्वाच्छाखिनां सफलाः फलाः॥ ७२<br>सदोपगीतभ्रमरसुरस्त्रीसेवितं परम्।<br>सर्वपापक्षयकरं शैलस्येव प्रहारकम्॥ ७३<br>वानरैः क्रीडमानैश्च देशाद् देशान् नराधिप।<br>हिमपुञ्जाः कृतास्तत्र चन्द्रबिम्बसमप्रभाः॥ ७४<br>तदाश्रमं समंताच्च हिमसंरुद्धकन्दरैः।<br>शैलवाटैः परिवृतमगम्यं मनुजैः सदा॥ ७५<br>पूर्वाराधितभावोऽसौ महाराजः पुरूरवाः।<br>तदाश्रमपदं प्राप्तो देवदेवप्रसादतः॥ ७६<br>तदाश्रमं श्रमशमनं मनोहरं<br>मनोहरैः कुसुमशतैरलङ्कृतम् ।<br>कृतं स्वयं रुचिरमथात्रिणा शुभं<br>शुभावहं तद् ददृशे स मद्रराट्॥ ७७करते हैं। वहीं एक दूसरा शिखर भी है, उस सुन्दर शिखरपर जलसे बोझिल हुए बादल बड़ी-बड़ी शिलाओंके साथ नित्य बरसते रहते हैं। जहाँ वह मनको लुभानेवाला आश्रम स्थित है, वहाँकी पृथ्वी कामनाओंको पूर्ण करनेवाली है। प्रधान देवताओंके उपयोगमें आनेके कारण वहाँके वृक्षोंके फल भी सफलताको प्राप्त करते रहते हैं। वह श्रेष्ठ आश्रम सदा भ्रमरोंकी गुंजारसे गुंजायमान एवं देवाङ्गनाओंसे सुसेवित तथा उस पर्वतके प्रहरीकी तरह सम्पूर्ण पापोंका विनाशक था। नरेश्वर! एक स्थानसे दूसरे स्थानपर क्रीडा करते हुए बन्दरोंने वहाँकी बर्फराशिको चाँदनीके समान उज्ज्वल बना दिया था। वह आश्रम चारों ओरसे हिमाच्छादित कन्दराओं और कँकरीले-पथरीले मार्गोंसे घिरा हुआ था, इसलिये वह मनुष्योंके लिये सदा अगम्य था। पूर्वजन्मकी आराधनाके प्रभावसे युक्त महाराज पुरूरवा देवाधिदेव भगवान्‌की कृपासे उस आश्रमपर पहुँचे थे। वह आश्रम थकावटको दूर करनेवाला, मनोहर, मनोमोहक पुष्पोंसे अलंकृत, स्वयं महर्षिद्वारा सुन्दररूपमें निर्मित, मङ्गलमय एवं शुभकारक था, उसे मद्रराज पुरूरवाने देखा॥ ६४–७७॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे भुवनकोशेऽत्र्याश्रमवर्णनं नामाष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके भुवनकोश-वर्णन-प्रसङ्गमें अत्रि-आश्रमवर्णन नामक एक सौ अठारहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ११८ ॥


एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय

आश्रमस्थ विवरमें पुरूरवा* का प्रवेश, आश्रमकी शोभाका वर्णन तथा पुरूरवाकी तपस्या

सूत उवाच<br>तत्र यौ तौ महाशृङ्गौ महावर्णौ महाहिमौ।<br>तृतीयं तु तयोर्मध्ये शृङ्गमत्यन्तमुच्छ्रितम्॥ १<br>नित्यातपशिलाजालं सदाभ्रपरिवर्जितम्।<br>तस्याधस्ताद् वृक्षगणो दिशां भागे च पश्चिमे॥ २<br>जातीलतापरिक्षिप्तं विवरं चारुदर्शनम्।<br>दृष्ट्वैव कौतुकाविष्टस्तं विवेश महीपतिः॥ ३**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वहाँ सदा हिमाच्छादित तथा रंग-बिरंगे जो दो महान् शिखर थे, उनके बीचमें एक तीसरा शिखर था, जो अत्यन्त ऊँचा था। वह बादलोंसे सदा शून्य रहता था, जिससे उसकी शिलाएँ नित्य सन्तप्त बनी रहती थीं। उस शिखरके नीचे पश्चिम दिशामें वृक्षोंके समूह शोभा पा रहे थे। उन्हींके बीचमें एक अत्यन्त सुन्दर विवर (छिद्र) था, जो मालतीकी लताओंसे आच्छादित था। उसे देखते ही राजा पुरूरवा आश्चर्यचकित हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने उस विवरमें

* इस पुराणमें—यजुर्वेद ५। २, ऋग्वेद १०। ९५, शतपथब्रा० ११। ५ आदिमें संकथित पुरूरवाके कथानकका सर्वाधिक विस्तारसे उपवृंहण हुआ है और कई बार उसकी पुनरुक्ति भी हुई है। इससे विक्रमोर्वशीयमें कालिदास एवं पार्जीटर आदि आधुनिक पाश्चात्त्य विद्वान् लेखक बहुत प्रभावित हुए हैं। निघण्टु ५। ४ तथा यास्क्रीय निरुक्त १०। ४६ एवं ऋग्वेद १०। ९५। २ के अनुसार ये सूर्य या मूल प्राणतत्त्व हैं। पाणि० ६। ३। १३७ के अनुसार यहाँ 'पुरू' में दीर्घ हुआ है।

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