भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 47
* अध्याय ८ *३७

| चिच्छेद वृत्रहन्ता वै पुनस्तदुदरे स्थितः।<br>एवमेकोनपञ्चाशद् भूत्वा ते रुरुदुर्भृशम्॥ ५७<br>इन्द्रो निवारयामास मा रोदिष्टः पुनः पुनः।<br>ततः स चिन्तयामास किमेतदिति वृत्रहा॥ ५८<br>धर्मस्य कस्य माहात्म्यात् पुनः सञ्जीवितास्त्वमी।<br>विदित्वा ध्यानयोगेन मदनद्वादशीफलम्॥ ५९<br>नूनमेतत् परिणतमधुना कृष्णपूजनात्।<br>वज्रेणापि हताः सन्तो न विनाशमवाप्नुयुः॥ ६०<br>एकोऽप्यनेकतामाप यस्मादुदरगोऽप्यलम्।<br>अवध्या नूनमेते वै तस्माद् देवा भवन्त्विति॥ ६१<br>यस्मान्मा रुदतेत्युक्ता रुदन्तो गर्भसंस्थिताः।<br>मरुतो नाम ते नाम्ना भवन्तु मखभागिनः॥ ६२<br>ततः प्रसाद्य देवेशः क्षमस्वेति दितिं पुनः।<br>अर्थशास्त्रं समास्थाय मयैतद् दुष्कृतं कृतम्॥ ६३<br>कृत्वा मरुद्गणं देवैः समानममराधिपः।<br>दितिं विमानमारोप्य ससुतामनयद् दिवम्॥ ६४<br>यज्ञभागभुजो जाता मरुतस्ते ततो द्विजाः।<br>न जग्मुरैक्यमसुरैरतस्ते सुरवल्लभाः॥ ६५ | इन्द्रने मना किया, (परंतु जब वे चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने पुनः उन रोते हुए शिशुओंमें प्रत्येकके सात-सात टुकड़े कर दिये। उस समय भी इन्द्र दितिके उदरमें ही स्थित थे। इस प्रकार वे टुकड़े उनचास शिशुओंके रूपमें परिवर्तित होकर जोर-जोरसे रुदन करने लगे। इन्द्र उन्हें बारम्बार मना करते हुए कह रहे थे कि ‘मत रोओ।’ (परंतु वे जब चुप नहीं हुए, तब) इन्द्रने मनमें विचार किया कि इसका क्या रहस्य है? किस धर्मके माहात्म्यसे ये सभी (मेरे वज्रद्वारा काटे जानेपर भी) पुनः जीवित हैं? तत्पश्चात् ध्यानयोगके द्वारा इन्द्रको ज्ञात हो गया कि यह मदनद्वादशीव्रतका फल है। अवश्य ही श्रीकृष्णके पूजनके प्रभावसे इस समय यह घटना घटी है, जो वज्रद्वारा मारे जानेपर भी ये शिशु विनाशको नहीं प्राप्त हुए। इसी कारण उदरमें स्थित रहते हुए एकसे अनेक (उनचास) हो गये। इसलिये अवश्य ही ये अवध्य हैं और (मेरी इच्छा है कि ये) देवता हो जायँ। चूँकि गर्भमें स्थित रहकर रोते हुए इनको मैंने ‘मा रुदत’—मत रोओ—ऐसा कहा है, इसलिये ये ‘मरुत्’ नामसे प्रसिद्ध होंगे और इन्हें भी यज्ञोंमें भाग मिलेगा। ऐसा कहकर इन्द्र दितिके उदरसे बाहर निकल आये और दितिको प्रसन्न करके उससे क्षमा-याचना करने लगे—‘देवि! अर्थशास्त्रका आश्रय लेकर मैंने यह दुष्कर्म कर डाला है, मुझे क्षमा करो।’ इस प्रकार देवराजने मरुद्गणको देवताओंके समान बनाया और पुत्रोंसमेत दितिको विमानमें बैठाकर वे अपने साथ स्वर्गलोकको ले गये। विप्रवरो! इसी कारण मरुद्गण यज्ञोंमें भाग पानेके अधिकारी हुए। उन्होंने असुरोंके साथ एकता नहीं की; इसलिये वे देवताओंके प्रेमपात्र हो गये॥ ५०—६५॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदिसर्गे मरुदुत्पत्तौ मदनद्वादशीव्रतं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणेके आदिसर्गमें मरुद्गणकी उत्पत्तिके प्रसङ्गमें मदनद्वादशीव्रत-वर्णन नामक सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७ ॥


आठवाँ अध्याय

प्रत्येक सर्गके अधिपतियोंका अभिषेचन तथा पृथुका राज्याभिषेक

| ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गश्च यः सूत कथितो विस्तरेण तु।<br>प्रतिसर्गे च ये येषामधिपास्तान् वदस्व नः॥ १ | **ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! आपने हम लोगोंके प्रति जिस आदिसर्ग और प्रतिसर्गका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है, उन सर्गोंमें जो जिस वर्गके अधिपति हुए, उनके विषयमें अब हमें बतलाइये॥ १॥ |

मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 47, कुल 1098 में से · BharatKosha