मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५७४ * मत्स्यपुराण *
| परस्परं व्यलीयन्त पृष्ठेषु व्यस्त्रपाणयः।<br>स्वेषु बाधे व्यलीयन्त गजेषु तुरगेषु च॥ १८३<br>रथेषु त्वमरास्त्रस्तास्तत्र तत्र निलिल्यिरे।<br>अपरे कुञ्चितैर्गात्रैः स्वहस्तपिहिताननाः॥ १८४<br>इतश्चेतश्च सम्भ्रान्ता बभ्रमुर्वै दिशो दश।<br>एवंविधे तु संग्रामे तुमुले देवसंक्षये॥ १८५<br>दृश्यन्ते पतिता भूमौ शस्त्रभिन्नाङ्गसन्धयः।<br>विभुजा भिन्नमूर्धानस्तथा छिन्नोरुजानवः॥ १८६<br>विपर्यस्तरथासङ्गा निष्पिष्टध्वजपङ्क्तयः।<br>निर्भिन्नाङ्गैस्तुरङ्गैस्तु गजैश्चाचलसन्निभैः॥ १८७<br>स्रुतरक्तह्रदैर्भूमिर्विकृताविकृता बभौ।<br>एवमाजौ बली दैत्यः कालनेमिर्महासुरः॥ १८८<br>जघ्ने मुहूर्तमात्रेण गन्धर्वाणां दशायुतम्।<br>यक्षाणां पञ्चलक्षाणि रक्षसामयुतानि षट्॥ १८९<br>त्रीणि लक्षाणि जघ्ने स किन्नराणां तरस्विनाम्।<br>जघ्ने पिशाचमुख्यानां सप्तलक्षाणि निर्भयः॥ १९०<br>इतरेषामसंख्याताः सुरजातिनिकायिनाम्।<br>जघ्ने स कोटीः संक्रुद्धश्चित्रास्त्रैश्शस्त्रकोविदः॥ १९१ | वे अस्त्र छोड़कर अपने-अपने हाथियों और घोड़ोंकी पीठोंपर चिपककर छिप गये। कहीं-कहीं भयभीत हुए देवगण रथोंमें लुक-छिप रहे थे। कुछ अन्य देवताओंके शरीर भयसे सिकुड़ गये थे, वे भयवश अपने हाथसे मुखको ढके हुए दसों दिशाओंमें इधर-उधर भाग-दौड़ कर रहे थे। इस प्रकार उस देव-विनाशक भीषण संग्राममें शस्त्रोंके आघातसे जिनकी अङ्गसन्धियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, भुजाएँ कट गयी थीं, मस्तक विदीर्ण हो गये थे तथा जंघा और जानु कट गये थे, ऐसे सैनिक, टूटे हुए हरसेवाले रथ और चूर-चूर हुए ध्वजाओंकी कतारें भूतलपर पड़ी हुई दीख रही थीं। जिनके शरीरोंसे बहते हुए रक्तसे गड्ढे भर जाते थे, ऐसे विदीर्ण अङ्गोंवाले घोड़ों और पर्वत-सदृश विशालकाय गजराजोंसे पटी हुई वह रणभूमि विकृत और बीभत्स दिखायी पड़ रही थी। इस प्रकार उस युद्धमें महाबली महासुर कालनेमि दैत्यने दो ही घड़ीमें एक लाख गन्धर्वों, पाँच लाख यक्षों, साठ हजार राक्षसों, तीन लाख वेगशाली किंनरों और सात लाख प्रधान-प्रधान पिशाचोंको कालके हवाले कर दिया। इनके अतिरिक्त उसने निर्भय होकर अन्य देवजातियोंके असंख्य वीरोंका संहार किया तथा अस्त्रविद्यानिपुण कालनेमिने विचित्र ढंगसे अस्त्रोंके प्रहारसे करोड़ों देवताओंको यमलोकका पथिक बना दिया॥ १८१-१९१॥ |
| एवं परिभवे भीमे तदा त्वमरसंक्षये।<br>संक्रुद्धावश्विनौ देवौ चित्रास्त्रकवचोज्ज्वलौ॥ १९२<br>जघ्नतुः समरे दैत्यं कृतान्तानलसंनिभम्।<br>तमासाद्य रणे घोरमेकैकः षष्टिभिः शरैः॥ १९३<br>जघ्ने मर्मसु तीक्ष्णाग्रैरसुरं भीमदर्शनम्।<br>ताभ्यां बाणप्रहारैः स किंचिदायस्तचेतनः॥ १९४<br>जग्राह चक्रमष्टारं तैलधौतं रणान्तकम्।<br>तेन चक्रेण सोऽश्विभ्यां चिच्छेद रथकूबरम्॥ १९५<br>जग्राहाथ धनुर्दैत्यः शरांश्चाशीविषोपमान्।<br>ववर्ष भिषजो मूर्ध्नि संछाद्याकाशगोचरम्॥ १९६ | उस समय इस प्रकारकी भयंकर पराजय और देवताओंका संहार उपस्थित होनेपर चित्र-विचित्र अस्त्र और उज्ज्वल कवचसे सुसज्जित हो दोनों देवता अश्विनीकुमार क्रोधमें भरे हुए समरभूमिमें आगे बढ़े और कृतान्त एवं अग्निके समान पराक्रमी उस दैत्यपर प्रहार करने लगे। उस भयावनी आकृतिवाले भयंकर असुरको रणभूमिमें सम्मुख पाकर एक-एकने तीखे अग्रभागवाले साठ-साठ बाणोंसे उसके मर्मस्थानोंपर आघात किया। उन दोनों अश्विनीकुमारोंके बाण-प्रहारसे उसका चित्त कुछ दुःखी हो गया। फिर उसने आठ अरोंवाले चक्रको हाथमें लिया, जो तेलसे सफ़ाया हुआ तथा रणमें अन्तकके समान विकराल था। उसने उस चक्रसे अश्विनीकुमारोंके रथके कूबरको काट गिराया। तत्पश्चात् उस दैत्यने धनुष और सर्पके समान जहरीले बाणोंको उठाया और आकाशमण्डलको बाणोंसे आच्छादित |