भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 585, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 585

* अध्याय १५० * ५७५

तावप्यस्त्रैश्चिच्छिदतुः शितैस्तैर्दैत्यसायकान्।<br>तच्च कर्म तयोर्दृष्ट्वा विस्मितः कोपमाविशत्॥ १९७<br><br>महता स तु कोपेन सर्वायोमयसादनम्।<br>जग्राह मुद्गरं भीमं कालदण्डविभीषणम्॥ १९८<br><br>स ततो भ्राम्य वेगेन चिक्षेपाश्विरथं प्रति।<br>तं तु मुद्गरमायान्तमालोक्याम्बरगोचरम्॥ १९९<br><br>त्यक्त्वा रथौ तु तौ वेगादाप्लुतौ तरसाश्विनौ।<br>तौ रथौ स तु निष्पिष्य मुद्गरोऽचलसंनिभः॥ २००<br><br>दारयामास धरणीं हेमजालपरिष्कृतः।<br>तस्य कर्माश्विनौ दृष्ट्वा भिषजौ चित्रयोधिनौ॥ २०१<br><br>वज्रास्त्रं तु प्रकुर्वाते दानवेन्द्रनिवारणम्।<br>ततो वज्रमयं वर्षं प्रावर्तततिदारुणम्॥ २०२करके उन दोनों देववैद्योंके मस्तकोंपर बाणवृष्टि प्रारम्भ की। तब उन दोनों देवोंने भी अपने तीखे अस्त्रोंसे उस दैत्यके बाणोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। उन दोनोंके उस कर्मको देखकर आश्चर्यचकित हुआ कालनेमि क्रुद्ध हो उठा। फिर तो उसने बड़े क्रोधसे अपने भयंकर मुद्गरको, जिसका सर्वाङ्गभाग लोहेका बना हुआ था तथा कालदण्डके समान अत्यन्त भीषण था, हाथमें लिया और बड़े वेगसे घुमाकर उसे अश्विनीकुमारोंके रथपर फेंक दिया। आकाशमार्गसे उस मुद्गरको अपनी ओर आते देखकर दोनों अश्विनीकुमार अपने-अपने रथको छोड़कर बड़े वेगसे भूतलपर कूद पड़े। तब स्वर्णसमूहसे सुसज्जित एवं पर्वतके समान विशाल उस मुद्गरने उन दोनों रथोंको चूर-चूर करके पृथिवीको विदीर्ण कर दिया। उसके उस कर्मको देखकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले देववैद्य अश्विनीकुमारोंने दानवेन्द्रोंको विमुख करनेवाले वज्रास्त्रका प्रयोग किया। फिर तो अत्यन्त भीषण वज्रमयी वृष्टि होने लगी॥ १९२—२०२॥
खरवज्रप्रहारैस्तु दैत्येन्द्रः स परिष्कृतः।<br>रथो ध्वजो धनुश्चक्रं कवचं चापि काञ्चनम्॥ २०३<br><br>क्षणेन तिलशो जातं सर्वसैन्यस्य पश्यतः।<br>तद् दृष्ट्वा दुष्करं कर्म सोऽश्विभ्यां भीमविक्रमः॥ २०४<br><br>नारायणास्त्रं बलवान् मुमोच रणमूर्धनि।<br>वज्रास्त्रं शमयामास दानवेन्द्रोऽस्त्रतेजसा॥ २०५<br><br>तस्मिन् प्रशान्ते वज्रास्त्रे कालनेमिरनन्तरम्।<br>जीवग्राहं ग्राहयितुमश्विनौ तु प्रचक्रमे॥ २०६<br><br>तावश्विनौ रणाद् भीतौ सहस्राक्षरथं प्रति।<br>प्रयातौ वेपमानौ तु पदा शस्त्रविवर्जितौ॥ २०७<br><br>तयोरनुगतो दैत्यः कालनेमिर्महाबलः।<br>प्राप्येन्द्रस्य रथं क्रूरो दैत्यानीकपदानुगः॥ २०८<br><br>तं दृष्ट्वा सर्वभूतानि वित्रैसुर्विह्वलानि तु।<br>दृष्ट्वा दैत्यस्य तत् क्रौर्यं सर्वभूतानि मेनिरे॥ २०९उस समय दैत्येन्द्र कालनेमि भयंकर वज्र-प्रहारोंसे आच्छादित हो उठा। क्षणमात्रमें ही सभी सैनिकोंके देखते-देखते उसके रथ, ध्वज, धनुष, चक्र और स्वर्णनिर्मित कवचके तिलके समान टुकड़े-टुकड़े हो गये। अश्विनीकुमारोंद्वारा किये गये उस दुष्कर कर्मको देखकर भयंकर पराक्रमी एवं महाबली दानवेन्द्र कालनेमिने उस युद्धके मुहानेपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया और उस अस्त्रके तेजसे वज्रास्त्रको शान्त कर दिया। उस वज्रास्त्रके शान्त हो जानेके बाद कालनेमि दोनों अश्विनीकुमारोंको जीते-जी पकड़ लेनेका प्रयत्न करने लगा। तब वे दोनों अश्विनीकुमार भयभीत होकर पैदल ही रणभूमिसे भागकर इन्द्रके रथके निकट जा पहुँचे। उस समय उनके शरीर काँप रहे थे और उन्होंने अस्त्रका भी त्याग कर दिया था। उस समय महाबली एवं क्रूर स्वभाववाला दैत्यराज कालनेमि भी दैत्योंकी सेनाके साथ अश्विनीकुमारोंका पीछा करते हुए इन्द्रके रथके निकट पहुँचा। उसे देखकर सभी प्राणी विह्वल हो गये और सबके मनमें भय छा गया। दैत्यराज कालनेमिके उस क्रूर कर्मको देखकर सभी प्राणियोंने