मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 589, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 589
| * अध्याय १५१ * | ५७९ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अश्वारूढश्च मथनो जम्भकश्चोष्ट्रवाहनः।<br>शुम्भोऽपि विपुलं मेषं समारुह्याब्रजद् रणम्॥ ५<br>अपरे दानवेन्द्रास्तु यत्ता नानास्त्रपाणयः।<br>आजघ्नुः समरे क्रुद्धा विष्णुमक्लिष्टकारिणम्॥ ६<br>परिघेण निमिर्दैत्यो मथनो मुद्गरेण तु।<br>शुम्भः शूलेन तीक्ष्णेन प्रासेन ग्रसनस्तथा॥ ७<br>चक्रेण महिषः क्रुद्धो जम्भः शक्त्या महारण्ये।<br>जघ्नुर्नारायणं सर्वे शेषास्तीक्ष्णैश्च मार्गणैः॥ ८<br>तान्यस्त्राणि प्रयुक्तानि शरीरं विविशुर्हरेः।<br>गुरुक्तान्युपदिष्टानि सच्छिष्यस्य श्रुताविव॥ ९ | किरीट और कवचसे लैस थे। साथ ही घोड़ेपर चढ़ा हुआ मथन, ऊँटपर बैठा हुआ जम्भक और विशालकाय मेषपर सवार हुआ शुम्भ भी रणभूमिमें पहुँचे। क्रुद्ध हुए अन्यान्य दानवेन्द्र भी विभिन्न प्रकारके अस्त्र हाथमें लिये हुए सतर्क होकर समरभूमिमें अक्लिष्टकर्मा विष्णुपर प्रहार कर रहे थे। उस भयंकर युद्धमें दैत्यराज निमिने परिघसे, मथनने मुद्गरसे, शुम्भने त्रिशूलसे, ग्रसनने तीखे भालेसे, महिषने चक्रसे, क्रोधसे भरे हुए जम्भने शक्तिसे तथा शेष सभी दानवराज तीखे बाणोंसे नारायणपर चोट कर रहे थे। दैत्योंद्वारा चलाये गये वे अस्त्र श्रीहरिके शरीरमें उसी प्रकार प्रवेश कर रहे थे, जैसे गुरुद्वारा उपदिष्ट वाक्य उत्तम शिष्यके कानमें प्रविष्ट हो जाते हैं॥ १—९॥ |
| असम्भ्रान्तो रणे विष्णुरथ जग्राह कार्मुकम्।<br>शरांश्चाशीविषाकारांस्तैलधौतान्जिह्मगान्॥ १०<br>ततोऽभिसंध्य दैत्यांस्तानाकर्णाकृष्टकार्मुकः।<br>अभ्यद्रवद् रणे क्रुद्धो दैत्यानीके तु पौरुषात्॥ ११<br>निमिं विव्याध विंशत्या बाणानामग्निवर्चसाम्।<br>मथनं दशभिर्बाणैः शुम्भं पञ्चभिरेव च॥ १२<br>एकेन महिषं क्रुद्धो विव्याधोरसि पत्रिणा।<br>जम्भं द्वादशभिस्तीक्ष्णैः सर्वांश्चैककशोऽष्टभिः॥ १३<br>तस्य तल्लाघवं दृष्ट्वा दानवाः क्रोधमूर्च्छिताः।<br>नर्दमानाः प्रयत्नेन चक्रुरत्यद्भुतं रणम्॥ १४<br>चिच्छेदाथ धनुर्विष्णोर्निमिर्भल्लेन दानवः।<br>संध्यमानं शरं हस्ते चिच्छेद महिषासुरः॥ १५<br>पीडयामास गरुडं जम्भस्तीक्ष्णैस्तु सायकैः।<br>भुजं तस्याहनद् गाढं शुम्भो भूधरसंनिभः॥ १६<br>छिन्ने धनुषि गोविन्दो गदां जग्राह भीषणाम्।<br>तां प्राहिणोत् स वेगेन मथनाय महाहवे॥ १७<br>तामप्राप्तां निमिर्बाणैश्चिच्छेद तिलशो रणे।<br>तां नाशमागतां दृष्ट्वा हीनाग्रे प्रार्थनामिव॥ १८ | तदनन्तर भगवान् विष्णुने रणभूमिमें स्थिरचित्त हो अपने धनुष तथा तेलसे धुले हुए एवं सीधे लक्ष्यवेध करनेवाले सर्पाकार बाणोंको हाथमें लिया और उन दैत्योंको लक्ष्य बनाकर धनुषको कानतक खींचकर उसपर उन बाणोंका संधान किया। तत्पश्चात् वे क्रोधमें भरकर रणभूमिमें पुरुषार्थपूर्वक दैत्योंकी सेनापर चढ़ आये। उन्होंने अग्निके समान तेजस्वी बीस बाणोंसे निमिको, दस बाणोंसे मथनको और पाँच बाणोंसे शुम्भको बींध दिया। फिर क्रुद्ध हो एक बाणसे महिषकी छातीपर चोट पहुँचायी तथा बारह तीखे बाणोंसे जम्भको घायल कर शेष सभी दानवेश्वरोंमेंसे प्रत्येकको आठ-आठ बाणोंसे छेद डाला। भगवान् विष्णुके उस हस्तलाघवको देखकर दानवगण क्रोधसे तिलमिला उठे और सिंहनाद करते हुए प्रयत्नपूर्वक अत्यन्त अद्भुत युद्ध करने लगे। उस समय दानवराज निमिने भल्ल नामक बाण मारकर भगवान् विष्णुके धनुषको काट दिया। फिर महिषासुरने संधान किये जाते हुए बाणको उनके हाथमें ही काट गिराया। जम्भने तीखे बाणोंके प्रहारसे गरुडको पीड़ित कर दिया। पर्वताकार शुम्भने उनकी भुजापर गम्भीर आघात किया। धनुषके कट जानेपर भगवान् गोविन्दने भीषण गदा हाथमें ली और उस भयंकर युद्धके समय उसे वेगपूर्वक घुमाकर मथनके ऊपर छोड़ दिया। वह उसके निकटतक पहुँच भी न पायी थी कि निमिने रणभूमिमें अपने बाणोंके प्रहारसे उसके तिलके समान टुकड़े-टुकड़े कर दिये। दयाहीन पुरुषके समक्ष विफल हुई प्रार्थनाकी |