मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५८० * मत्स्यपुराण *
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जग्राह मुद्गरं घोरं दिव्यरत्नपरिष्कृतम्।<br>तं मुमोचाथ वेगेन निमिमुद्दिश्य दानवम्॥ १९ | तरह उस गदाको नष्ट हुई देखकर भगवान्ने दिव्य रत्नोंसे सुसज्जित भयंकर मुद्गर उठाया और दानवराज निमिको लक्ष्य करके उसे वेगपूर्वक फेंक दिया॥ १०—१९॥ |
| तमायान्तं वियत्येव त्रयो दैत्या निवारयन्।<br>गदया जम्भदैत्यस्तु ग्रसनः पट्टिशेन तु॥ २०<br>शक्त्या च महिषो दैत्यः स्वपक्षजयकाङ्क्षया।<br>निराकृतं तमालोक्य दुर्जने प्रणवं यथा॥ २१<br>जग्राह शक्तिमुग्रामष्टघण्टोत्कटस्वनाम्।<br>जम्भाय तां समुद्दिश्य प्राहिणोद् रणभीषणः॥ २२<br>तामम्बरस्थां जग्राह गजो दानवनन्दनः।<br>गृहीतां तां समालोक्य शिक्षामिव विवेकिभिः॥ २३<br>दृढं भारसहं सारमन्यदादाय कार्मुकम्।<br>रौद्रास्त्रमभिसंधाय तस्मिन् बाणं मुमोच ह॥ २४<br>ततोऽस्त्रतेजसा सर्वं व्याप्तं लोकं चराचरम्।<br>ततो बाणमयं सर्वमाकाशं समदृश्यत॥ २५<br>भूर्दिशो विदिशश्चैव बाणजालमया बभुः।<br>दृष्ट्वा तदस्त्रमाहात्म्यं सेनानीर्ग्रसनोऽसुरः॥ २६<br>ब्राह्ममस्त्रं चकारासौ सर्वास्त्रविनिवारणम्।<br>तेन तत् प्रशमं यातं रौद्रास्त्रं लोकघस्मरम्॥ २७<br>अस्त्रे प्रतिहते तस्मिन् विष्णुर्दानवसूदनः।<br>कालदण्डास्त्रमकरोत् सर्वलोकभयंकरम्॥ २८<br>संधीयमाने तस्मिंस्तु मारुतः परुषो ववौ।<br>चकम्पे च मही देवी दैत्या भिन्नधियोऽभवन्॥ २९<br>तदस्त्रमुग्रं दृष्ट्वा तु दानवा युद्धदुर्मदाः।<br>चक्रुरस्त्राणि दिव्यानि नानारूपाणि संयुगे॥ ३० | उस मुद्गरको आते हुए देखकर तीन दैत्योंनै—जम्भ दैत्यने गदासे, ग्रसनने पट्टिशसे और महिष दैत्यने शक्तिसे प्रहार करके आकाशमार्गमें ही उसका निवारण कर दिया; क्योंकि उनके मन अपने पक्षकी विजयकी अभिलाषासे पूर्ण थे। तब दुर्जनके प्रति किये गये प्रेमालापकी भाँति उस मुद्गरको विफल हुआ देखकर रणभूमिमें भयानक कर्म करनेवाले भगवान्ने आठ घंटियोंके उत्कट शब्दसे युक्त एवं कठोर अग्रभागवाली शक्ति हाथमें ली और उसे जम्भको लक्ष्य करके छोड़ दिया। दानवनन्दन गजने उस शक्तिको आकाशमार्गमें ही पकड़ लिया। विवेकियोंद्वारा धारण की गयी शिक्षाकी भाँति उस शक्तिको पकड़ी गयी देखकर भगवान्ने एक दूसरा धनुष उठाया, जो सुदृढ़, सारयुक्त और भार सहन करनेमें सक्षम था। उसपर रौद्रास्त्रका अभिसंधान करके उन्होंने उस बाणको छोड़ दिया। उस अस्त्रके तेजसे सारा चराचर जगत् व्याप्त हो गया और सारा आकाशमण्डल बाणमय दिखायी पड़ने लगा। सारी पृथ्वी, दिशाएँ और विदिशाएँ बाणसमूहसे आच्छादित हो गयीं। उस अस्त्रके प्रभावको देखकर सेनापति असुरराज ग्रसनने ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया, जो सम्पूर्ण अस्त्रोंको निवारण करनेमें समर्थ था। उसके प्रभावसे वह लोकभक्षक रौद्रास्त्र शान्त हो गया। उस अस्त्रके विफल हो जानेपर दानवोंके संहारक विष्णुने कालदण्डास्त्रको प्रकट किया, जो सम्पूर्ण लोकोंको भयभीत करनेवाला था। उस अस्त्रके संधान करते ही प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वीदेवी काँप उठीं और दैत्योंकी बुद्धि विकृत हो गयी। युद्धस्थलमें उस भयंकर अस्त्रको देखकर युद्धदुर्मद दानव नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंका प्रयोग करने लगे॥ २०—३०॥ |
| नारायणास्त्रं ग्रसनो गृहीत्वा<br>चक्रं निमिः स्वास्त्रवरं मुमोच।<br>ऐषीकमस्त्रं च चकारजम्भ-<br>स्तत्कालदण्डास्त्रनिवारणाय ॥ ३१<br>यावन्न संधानदशां प्रयान्ति<br>दैत्येश्वराश्चास्त्रनिवारणाय ।<br>तावत्क्षणेनैव जघान कोटी-<br>र्दैत्येश्वराणां सगजान् सहाश्वान्॥ ३२ | उस कालदण्डास्त्रका निवारण करनेके लिये ग्रसनने नारायणास्त्रको और निमिने अपने श्रेष्ठ अस्त्र चक्रको लेकर उसपर फेंका तथा जम्भने ऐषीकास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रके निवारणार्थ जबतक दैत्येश्वरगण अपने बाणोंका संधान भी नहीं कर पाये थे, उतनी ही देरमें कालदण्डास्त्रने दैत्येश्वरोंके घोड़े-हाथीसहित करोड़ों सैनिकोंका सफाया कर दिया। |