मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 595, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 595
* अध्याय १५३ * ५८५
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दैत्यांश्च मुदितान् दृष्ट्वा कर्तव्यं नाध्यगच्छत ।<br>अथायान्निकटे विष्णोः सुरेशः पाकशासनः ॥ २<br><br>उवाच चैनं मधुरं प्रोत्साहनपरिबृंहकम् ।<br>किमेभिः क्रीडसे देव दानवैर्दुष्टमानसैः ॥ ३<br><br>दुर्जनैर्लब्धरन्ध्रस्य पुरुषस्य कुतः क्रियाः ।<br>शक्तेनोपेक्षितो नीचो मन्यते बलमात्मनः ॥ ४<br><br>तस्मान्न नीचं मतिमान् दुर्गहीनं हि संत्यजेत् ।<br>अथाग्रेसरसम्पत्त्या रथिनो जयमाप्नुयुः ॥ ५<br><br>कस्ते सखाभवच्चाग्रे हिरण्याक्षवधे विभो ।<br>हिरण्यकशिपुर्दैत्यो वीर्यशाली मदोद्धतः ॥ ६<br><br>त्वां प्राप्यापश्यदसुरो विषमं स्मृतिविभ्रमम् ।<br>पूर्वेऽप्यतिबला ये च दैत्येन्द्राः सुरविद्विषः ॥ ७<br><br>विनाशमागताः प्राप्य शलभा इव पावकम् ।<br>युगे युगे च दैत्यानां त्वमेवान्तकरो हरे ॥ ८<br><br>तथैवाद्येह भग्नानां भव विष्णो सुराश्रयः ।<br>एवमुक्तस्ततो विष्णुर्व्यवर्धत महाभुजः ॥ ९ | उधर दैत्योंको हर्षसे उछलते देखकर इन्द्र किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। तदनन्तर पाकशासन देवराज इन्द्र भगवान् विष्णुके निकट आये और इस प्रकार उत्साहवर्धक मधुर वाणीमें बोले—'देव! आप इन दुष्ट चित्तवाले दानवोंके साथ क्यों खिलवाड़ कर रहे हैं? भला जिसके भेदको दुर्जन जान लेते हैं, उस पुरुषकी क्रियाएँ कैसे सफल हो सकती हैं? समर्थ पुरुषद्वारा उपेक्षाकी दृष्टिसे देखा गया नीच मनुष्य उसे अपना बल मानने लगता है। इसलिये बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि ऐसे आश्रयहीन नीच शत्रुकी कभी उपेक्षा न करे। विभो! प्रथम आक्रमण करनेपर रथियोंकी विजय होती है। पहले हिरण्याक्षका वध करते समय आपने यही किया। वहाँ कौन आपका मित्र हुआ था? दैत्यराज हिरण्यकशिपु परम पराक्रमी एवं गर्वोन्मत्त था, किंतु आपको अपने समक्ष पाकर उस असुरके भी होश उड़ गये और उसने आपको भयंकर रूपमें देखा। पूर्वकालमें जितने भी देवद्रोही महाबली दैत्येन्द्र हुए हैं, वे सभी आपके निकट पहुँचकर अग्निके समीप गये हुए पतंगोंकी तरह विनाशको प्राप्त हो गये। हरे! प्रत्येक युगमें आप ही दैत्योंके विनाशकर्ता होते आये हैं। विष्णो! उसी प्रकार आज इस युद्धमें पराजित हुए देवताओंके लिये आश्रयदाता होइये' ॥ १—८ १/२ ॥ |
| ऋद्ध्या परमया युक्तः सर्वभूताश्रयोऽरिहा ।<br>अथोवाच सहस्राक्षं कालक्षममधोक्षजः ॥ १०<br><br>दैत्येन्द्राः स्वैर्वधोपायैः शक्या हन्तुं हि नान्यतः ।<br>दुर्जयस्तारको दैत्यो मुक्त्वा सप्तदिनं शिशुम् ॥ ११<br><br>कश्चित् स्त्रीवध्यतां प्राप्तो वधेऽन्यस्य कुमारिका ।<br>जम्भस्तु वध्यतां प्राप्तो दानवः क्रूरविक्रमः ॥ १२<br><br>तस्माद् वीर्येण दिव्येन जहि जम्भं जगज्ज्वरम् ।<br>अवध्यः सर्वभूतानां त्वां विना स तु दानवः ॥ १३<br><br>मया गुप्तो रणे जम्भं जगत्कण्टकमुद्धर ।<br>तद्वैकुण्ठवचः श्रुत्वा सहस्राक्षोऽमरारिहा ॥ १४<br><br>समादिशत् सुरान् सर्वान् सैन्यस्य रचनां प्रति । | इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महाबाहु विष्णुका उत्साह विशेषरूपसे बढ़ गया और वे परमोत्कृष्ट ऋद्धिसे सम्पन्न हो गये। तत्पश्चात् सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रयस्थान एवं शत्रुसूदन विष्णुने इन्द्रसे (यह) समयोपयोगी बात कही—'देवराज! ये दैत्येन्द्र अपने द्वारा प्राप्त किये गये वधोपायोंसे ही मारे जा सकते हैं, किसी अन्य उपायसे इनकी मृत्यु नहीं हो सकती। इनमें दैत्यराज तारक तो सात दिनके बालकके अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियोंसे अजेय है। किसीका वध स्त्रीद्वारा होनेवाला है तो दूसरेके वधमें कुमारी कन्या कारण है, किंतु भयंकर पराक्रमी दानवराज जम्भ तो मारा जा सकता है। अतः आप दिव्य पराक्रम प्रकट करके जगत्को संतप्त करनेवाले जम्भका वध कीजिये; क्योंकि वह दानव आपके अतिरिक्त अन्य सभी प्राणियोंके लिये अवध्य है। युद्धभूमिमें मेरे द्वारा सुरक्षित होकर आप जगत्के लिये कण्टकभूत जम्भको उखाड़ फेंकिये।' भगवान् विष्णुके उस कथनको सुनकर असुरहन्ता सहस्राक्ष इन्द्रने सम्पूर्ण देवताओंको पुनः सेना-संगठनके लिये आदेश दिया॥ ९—१४ १/२ ॥ |