भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८६ * मत्स्यपुराण *

| यत्सारं सर्वलोकेषु वीर्यस्य तपसोऽपि च॥ १५<br><br>तदेकादशरुद्रांस्तु चकाराग्रेसरान् हरिः।<br>व्यालभोगाङ्गसन्नद्धा बलिनो नीलकन्धराः॥ १६<br><br>चन्द्रखण्डनृमुण्डालीमण्डितोरुशिखण्डिनः।<br>शूलज्वालावलिमाङ्गा भुजमण्डलभैरवाः॥ १७<br><br>पिङ्गोत्तङ्गजटाजूटाः सिंहचर्मानुषङ्गिनः।<br>कपालीशादयो रुद्रा विद्रावितमहासुराः॥ १८<br><br>कपाली पिङ्गलो भीमो विरूपाक्षो विलोहितः।<br>अजेशः शासनः शास्ता शम्भुश्चण्डो ध्रुवस्तथा॥ १९<br><br>एते एकादशानन्तबला रुद्राः प्रभाविनः।<br>पालयन्तो बलस्याग्रे दारयन्तश्च दानवान्॥ २०<br><br>आप्याययन्तस्त्रिदशान् गर्जन्त इव चाम्बुदाः।<br>हिमाचलाभे महति काञ्चनाम्बुरुहस्रजि॥ २१<br><br>प्रचलच्चामरे हेमघण्टासङ्घातमण्डिते।<br>ऐरावते चतुर्दन्ते मातङ्गेऽचलसंस्थिते॥ २२<br><br>महामदजलस्रावे कामरूपे शतक्रतुः।<br>तस्थौ हिमगिरेः शृङ्गे भानुमानिव दीप्तिमान्॥ २३ | उस समय श्रीहरिने कपाली, पिङ्गल, भीम, विरूपाक्ष, विलोहित, अजेश, शासन, शास्ता, शम्भु, चण्ड तथा ध्रुव—इन एकादश रुद्रोंको आगे कर दिया, जो सम्पूर्ण लोकोंमें पराक्रम और तपस्याके सारभूत थे। इन महाबली रुद्रोंके अङ्ग सर्पोंके फणोंसे कसकर बँधे हुए थे। इनके कंधे नीले थे। ये बाल चन्द्रमा, मनुष्योंके मुण्डोंकी माला और मयूरपिच्छसे सुशोभित थे। इनके अङ्ग त्रिशूलकी ज्वालासे उद्भासित तथा भुजमण्डल भयंकर थे। ये पीली तथा ऊँची जटाजूटोंसे विभूषित एवं सिंहचर्म पहने हुए थे। इन कपालीश आदि रुद्रोंने अनेकों बार प्रधान-प्रधान असुरोंको खदेड़ दिया था। अनन्त बलसम्पन्न एवं प्रभावशाली ये ग्यारहों रुद्र सेनाके अग्रभागकी रक्षा करते हुए दानवोंको विदीर्ण कर रहे थे और देवताओंको आश्वस्त करते हुए मेघकी भाँति गरज रहे थे। तत्पश्चात् हिमाचलके समान विशालकाय, गलेमें स्वर्णनिर्मित कमलोंकी मालासे सुशोभित, चँवरोंसे संवीजित, स्वर्णनिर्मित घंटासमूहोंसे विभूषित एवं युद्धस्थलमें पर्वतकी भाँति अडिग, चार दाँतवाले, महामदस्रावी कामरूपी ऐरावत गजराजपर इन्द्र सवार हुए। उस समय उनकी शोभा हिमालय पर्वतके शिखरपर स्थित प्रकाशमान सूर्यकी भाँति हो रही थी॥ १५–२३॥ | | तस्यारक्षत्पदं सव्यं मारुतोऽमितविक्रमः।<br>जुगोपापरमग्निस्तु ज्वालापूरितदिङ्मुखः॥ २४<br><br>पृष्ठरक्षोऽभवद् विष्णुः ससैन्यस्य शतक्रतोः।<br>आदित्या वसवो विश्वे मरुतश्चाश्विनावपि॥ २५<br><br>गन्धर्वा राक्षसा यक्षाः सकिन्नरमहोरगाः।<br>नानाविधायुधाश्चित्रा दधाना हेमभूषणाः॥ २६<br><br>कोटिशः कोटिशः कृत्वा वृन्दं चिन्होपलक्षितम्।<br>विश्रामयन्तः स्वां कीर्तिं बन्दिवृन्दपुरःसराः।<br>चेरुर्दैत्यवधे हृष्टाः सेन्द्राः सुरजातयः॥ २७<br><br>शतक्रतोरमरनिकायपालिता<br>पताकिनी गजशतवाजिनादिता।<br>सितातपत्रध्वजकोटिमण्डिता<br>बभूव सा दितिसुतशोकवर्धिनी॥ २८ | उस ऐरावतके दाहिने पैरकी रक्षामें अमित पराक्रमशाली वायुदेव तथा अपनी ज्वालासे दिशाओंके मुखको परिपूर्ण कर देनेवाले अग्निदेव उसके बायें पैरकी रक्षामें नियुक्त थे। भगवान् विष्णु सेनासहित इन्द्रके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहे थे। आदित्यगण, वसुगण, विश्वेदेवगण, मरुद्गण और दोनों अश्विनीकुमार तथा गन्धर्व, राक्षस, यक्ष, किन्नर और प्रधान-प्रधान नाग, जो नाना प्रकारके आयुधधारी, स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित और रंग-विरंगे वस्त्र धारण किये हुए थे, अपने-अपने चिह्नोंसे उपलक्षित एक-एक करोड़का यूथ बनाकर उसपर आगे-आगे बंदियोंद्वारा गायी जाती हुई अपनी कीर्तिकी छाप डाल रहे थे। इस प्रकार वे सभी देव-जातियाँ इन्द्रके साथ हर्षपूर्वक दैत्योंका वध करनेके लिये चल रही थीं। देवसमूहोंसे सुरक्षित, सैकड़ों हाथियों और घोड़ोंके शब्दोंसे निनादित एवं करोड़ों श्वेत छत्र और ध्वजाओंसे सुशोभित इन्द्रकी वह सेना दैत्योंका शोक बढ़ानेवाली थी। |