भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५८* मत्स्यपुराण *

| स्वायम्भुवोऽपि कालेन दक्षः प्राचेतसोऽभवत्।<br>पार्वती साभवद् देवी शिवदेहार्धधारिणी ॥ ६०<br>मेनागर्भसमुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा।<br>अरुन्धती जपन्त्येतत् प्राप योगमनुत्तमम्॥ ६१<br>पुरूरवाश्च राजर्षिर्लोके व्यजेयतामगात्।<br>ययातिः पुत्रलाभं च धनलाभं च भार्गवः ॥ ६२<br>तथान्ये देवदैत्याश्च ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।<br>वैश्याः शूद्राश्च बहवः सिद्धिमीयैर्यथेप्सिताम् ॥ ६३<br>यत्रैतल्लिखितं तिष्ठेत् पूज्यते देवसंनिधौ।<br>न तत्र शोको दौर्गत्यं कदाचिदपि जायते ॥ ६४ | कर दिया। पुनः यथोक्त समय आनेपर ब्रह्माके पुत्र दक्ष प्रचेताओैंके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा सतीदेवी शिवजीके अर्द्धाङ्गमें विराजमान होनेवाली पार्वतीरूपसे मेनाके गर्भसे प्रादुर्भूत हुई, जो भुक्ति (भोग) और मुक्तिरूप फल प्रदान करनेवाली हैं। इन्हीं पूर्वोक्त एक सौ आठ नामोंका जप करनेसे अरुन्धतीने सर्वोत्तम योगसिद्धि प्राप्त की, राजर्षि पुरूरवा लोकमें अजेय हो गये, ययातिने पुत्र-लाभ किया और भृगुनन्दनको धन-सम्पत्तिकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार अन्यान्य बहुत-से देवता, दैत्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रोंने भी (इन नामोंके जपसे) मनोवाञ्छित सिद्धियाँ प्राप्त कीं। जहाँ यह नामावली लिखकर रखी रहती है अथवा किसी देवताके संनिकट रखकर इसकी पूजा होती है, वहाँ कभी शोक और दुर्गर्तिका प्रवेश नहीं होता ॥ ५४—६४ ॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे पितृवंशान्वये गौरीनामाष्टोत्तरशतकथनं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें पितरोंके वंश-वर्णन-प्रसङ्गमें गौरीनामाष्टोत्तरशतकथन नामक तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३ ॥


चौदहवाँ अध्याय

अच्छोदाका पितृलोकसे पतन तथा उसकी प्रार्थनापर पितरोंद्वारा उसका पुनरुद्धार

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! मरीचिके वंशज
लोकाः सोमपथा नाम यत्र मारीचनन्दनाः।<br>वर्तन्ते देवपितरो देवा यान् भावयन्त्यलम् ॥ १देवताओंके पितृगण जहाँ निवास करते हैं, वे लोक सोमपथके नामसे विख्यात हैं। देवतालोग उन पितरोंका ध्यान किया करते हैं।
अग्निष्वात्ता इति ख्याता यज्वानो यत्र संस्थिताः।<br>अच्छोदा नाम तेषां तु मानसी कन्यका नदी ॥ २वे यज्ञपरायण पितृगण अग्निष्वात्त नामसे प्रसिद्ध हैं। जहाँ वे रहते हैं, वहीं अच्छोदा* नामकी एक नदी प्रवाहित होती है, जो उन्हीं पितरोंकी मानसी कन्या है।
अच्छोदं नाम च सरः पितृभिर्निर्मितं पुरा।<br>अच्छोदा तु तपश्चक्रे दिव्यं वर्षसहस्रकम् ॥ ३प्राचीनकालमें पितरोंने वहीं एक अच्छोद नामक सरोवरका भी निर्माण किया था। पूर्वकालमें अच्छोदाने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक घोर तपस्या की।
आजग्मुः पितरस्तुष्टाः किल दातुं च तां वरम्।<br>दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्यमाल्यानुलेपनाः ॥ ४उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर पितृगण उसे वर प्रदान करनेके लिये उसके समीप पधारे। वे सब-के-सब पितर दिव्यरूपधारी थे। उनके शरीरपर दिव्य सुगन्धका अनुलेप लगा हुआ था तथा गलेमें दिव्य पुष्पमाला लटक रही थी।
सर्वे युवानो बलिनः कुसुमायुधसंनिभाः।<br>तन्मध्येऽमावसुं नाम पितरं वीक्ष्य साङ्गना ॥ ५वे सभी नवयुवक, बलसम्पन्न एवं कामदेवके सदृश सौन्दर्यशाली थे। उन पितरोंमें अमावसु नामक पितरको

* इस अध्यायके अन्तमें वर्णित अच्छोद सरोवर और अच्छोदा नदी—दोनों कश्मीरमें हैं तथा परम प्रसिद्ध हैं। सरोवरको आजकल वहाँके लोग 'अच्छावत' कहते हैं।