मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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७८४ * मत्स्यपुराण *
एक सौ अठासीवाँ अध्याय
त्रिपुर-दाहका वृत्तान्त
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>यन्मां पृच्छसि कौन्तेय तन्मे कथयतः शृणु।<br>एतस्मिन्नन्तरे रुद्रो नर्मदातटमास्थितः॥ १<br>नाम्ना माहेश्वरं स्थानं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।<br>तस्मिन् स्थाने महादेवोऽचिन्तयत् त्रिपुरक्षयम्॥ २<br>गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा च वासुकिम्।<br>स्थानं कृत्वा तु वैशाखं विष्णुं कृत्वा शरोत्तमम्॥ ३<br>शल्ये चाग्निं प्रतिष्ठाप्य पुङ्खे वायुं समर्पयत्।<br>हयांश्च चतुरो वेदान् सर्वदेवमयं रथम्॥ ४<br>अभीषवोऽश्विनौ देवावक्षो वज्रधरः स्वयम्।<br>स तस्याज्ञां समादाय तोरणे धनदः स्थितः॥ ५<br>यमस्तु दक्षिणे हस्ते वामे कालस्तु दारुणः।<br>चक्रे त्वमरकोट्यस्तु गन्धर्वा लोकविश्रुताः॥ ६<br>प्रजापतिरथ श्रेष्ठो ब्रह्मा चैव तु सारथिः।<br>एवं कृत्वा तु देवेशः सर्वदेवमयं रथम्॥ ७<br>सोऽतिष्ठत् स्थाणुभूतस्तु सहस्रपरिवत्सरान्।<br>यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे स्थितानि वै॥ ८<br>त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि व्यभेदयत्।<br>शरः प्रचोदितस्तेन रुद्रेण त्रिपुरं प्रति॥ ९<br>भ्रष्टतेजाः स्त्रियो जाता बलं तासां व्यशीर्यत।<br>उत्पाताश्च पुरे तस्मिन् प्रादुर्भूताः सहस्रशः॥ १० | मार्कण्डेयजीने कहा—कुन्तीनन्दन! आपने जो मुझसे पूछा है, उसे मैं कह रहा हूँ, सुनिये! इसी बीच रुद्रदेव नर्मदा-तटपर आये। वहाँ जो तीनों लोकोंमें विख्यात माहेश्वर नामक स्थान है, उस स्थानपर बैठकर महादेव त्रिपुर-संहारके विषयमें सोचने लगे। उन्होंने मन्दराचलको गाण्डीव धनुष, वासुकि सर्पको धनुषकी प्रत्यञ्चा, कार्तिकेयको तरकस, विष्णुको श्रेष्ठ बाण, बाणके अग्रभागमें अग्निको और पुच्छ भागमें वायुको प्रतिष्ठित करके चारों वेदोंको घोड़ा बनाया। इस प्रकार उन्होंने सर्वदेवमय रथका निर्माण किया। दोनों अश्विनीकुमारोंको वागडोर और रथकी धुरीके रूपमें साक्षात् वज्रधारी इन्द्रको नियुक्त किया। उनकी आज्ञाको स्वीकार कर कुबेर तोरणके स्थानपर स्थित हुए। दाहिने हाथपर यम और बायें हाथपर भयंकर काल स्थित हुए। करोड़ों देवगण और लोकविश्रुत गन्धर्वगण रथके चक्के हुए तथा श्रेष्ठ प्रजापति ब्रह्मा सारथि बने। इस प्रकार शिवजी सर्वदेवमय रथका निर्माण कर उसपर स्थाणुरूपमें एक हजार वर्षोंतक स्थित रहे। जब तीनों पुर अन्तरिक्षमें एक साथ सम्मिलित हुए, तब उन्होंने तीन पर्वोंवाले तीन बाणोंसे उनका भेदन किया। जिस समय भगवान् रुद्रने उस बाणको त्रिपुरके ऊपर चलाया, उस समय वहाँकी स्त्रियाँ तेजोहीन हो गयीं और उनका पातिव्रत्य-बल नष्ट हो गया तथा उस नगरमें हजारों प्रकारके उपद्रव उत्पन्न होने लगे॥ १—१०॥ |
| त्रिपुरस्य विनाशाय कालरूपाभवंस्तदा।<br>अट्टहासं प्रमुञ्चन्ति हयाः काष्ठमयास्तदा॥ ११<br>निमेषोन्मेषणं चैव कुर्वन्ति चित्ररूपिणः।<br>स्वप्ने पश्यन्ति चात्मानं रक्ताम्बरविभूषितम्॥ १२<br>स्वप्ने तु सर्वे पश्यन्ति विपरीतानि यानि तु।<br>एतान् पश्यन्ति उत्पातांस्तत्र स्थाने तु ये जनाः॥ १३ | उस समय वे स्त्रियाँ भी त्रिपुर-नाशके लिये कालस्वरूप हो गयीं। काष्ठमय घोड़े अट्टहास करने लगे। चित्ररूपमें निर्मित जीव आँखको खोलने और बंद करने लगे। वहाँके निवासी स्वप्नमें अपनेको लाल वस्त्रसे अलंकृत देखने लगे। उन्हें स्वप्नमें सभी वस्तुएँ विपरीत दिखायी पड़ने लगीं। वे इस प्रकार इन उत्पातोंको देखने |