भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 886, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 886

८७६ * मत्स्यपुराण *


दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय

विषयुक्त पदार्थोंके लक्षण एवं उससे राजाके बचनेके उपाय

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>राजरक्षारहस्यानि यानि दुर्गे निधापयेत्।<br>कारयेद् वा महीभर्ता ब्रूहि तत्त्वानि तानि मे॥ १**मनुने पूछा—**भगवन्! राजाको राज्यकी रक्षाके लिये जिन रहस्यपूर्ण साधनोंको दुर्गमें संगृहीत या प्रस्तुत करना चाहिये, उन तत्त्वोंका मुझसे वर्णन कीजिये॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>शिरीषोदुम्बरशमीबीजपूरं घृतप्लुतम्।<br>क्षुद्योगः कथितो राजन् मासार्धस्य पुरातनैः॥ २**मत्स्यभगवान्‌ने कहा—**राजन्! शिरीष, गूलर, शमी और बिजौरा नींबू—इनको घृतमें परिप्लुतकर पंद्रह दिनों बाद सेवन करे, प्राचीन लोग इसे 'क्षुद्योग' कहते हैं।
कशेरुफलमूलानि इक्षुमूलं तथा विषम्।<br>दूर्वाक्षीरघृतैर्मण्डः सिद्धोऽयं मासिकः परः॥ ३कशेरुके मूल भाग तथा फल, ईखके मूल भाग और विषको दूब, दूध और घीके साथ सिद्ध करनेसे बना हुआ पदार्थ मण्ड कहलाता है। एक मास बाद इसका सेवन करना चाहिये।
नरं शस्त्रहतं प्रासो न तस्य मरणं भवेत्।<br>कल्माषवेणुना तत्र जनयेत्तु विभावसुम्॥ ४इनके सेवनसे हथियारोंसे घायल हुआ मनुष्य मर नहीं सकता। वहाँ चितकबरे रंगवाले बाँसके टुकड़ेसे अग्नि उत्पन्न करे। राजन्!
गृहे त्रिरपसव्यं तु क्रियते यत्र पार्थिव।<br>नान्योऽग्निर्ज्वलते तत्र नात्र कार्या विचारणा॥ ५उस अग्निको जिस घरमें अपसव्य होकर तीन बार प्रदक्षिणा करे, वहाँ कोई अन्य अग्नि नहीं जल सकती—इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।
कार्पासास्थ्ना भुजङ्गस्य तेन निर्मोचनं भवेत्।<br>सर्पनिर्वासने धूपः प्रशस्तः सततं गृहे॥ ६कपासके साथ सर्पकी हड्डी जलानेसे घरमेंसे सर्पोंका निष्कासन होता है। घरमें निरन्तर इस वस्तुकी धूप करना साँपको निकालनेके लिये विशेष प्रसिद्ध है।
सामुद्रसैन्धवयवा विद्युद्दग्धा च मृत्तिका।<br>तयानुलिप्तं यद्वेश्म नाग्निना दह्यते नृप॥ ७राजन्! समुद्री नमक, सेन्धा नमक और यवा—ये तीन प्रकारके लवण तथा विद्युत्‌से जली हुई मिट्टी—इन वस्तुओंसे जिस भवनकी लिपाई होती है, उसे अग्नि नहीं जला सकती।
दिवा च दुर्गे रक्ष्योग्निर्वाति वाते विशेषतः।<br>विषाच्च रक्ष्यो नृपतिस्तत्र युक्तिं निबोध मे॥ ८दुर्गमें दिनके समय विशेषकर जब वायुका प्रकोप हो, अग्निकी रक्षा करनी चाहिये। विषसे राजाकी रक्षा करनी चाहिये। उस विषयमें मैं युक्ति बतलाता हूँ, सुनिये।
क्रीडानििमत्तं नृपतिर्धारयेन्मृगपक्षिणः।<br>अन्नं वै प्राक् परीक्षेत वह्नौ चान्यतरेषु च॥ ९राजाको चाहिये कि दुर्गमें क्रीड़ाके लिये कुछ पशु तथा पक्षियोंको रखे। सर्वप्रथम उसे अग्निमें डालकर अथवा अन्य किन्हीं उपायोंसे अन्नकी परीक्षा कर लेनी चाहिये।
वस्त्रं पुष्पमलङ्कारं भोजनाच्छादनं तथा।<br>नापरीक्षितपूर्वं तु स्पृशेदपि महीपतिः॥ १०वस्त्र, पुष्प, आभरण, भोजन तथा आच्छादन (वस्त्र)—को राजा पहले परीक्षा किये बिना स्पर्श भी न करे।
स्याच्चासौ वक्त्रसंतप्तः सोद्वेगं च निरीक्षते।<br>विषदोऽथ विषं दत्तं यच्च तत्र परीक्षते॥ ११विष देनेवाले मनुष्यने यदि विष दे दिया है तो उसकी परीक्षाके ये निम्नलिखित लक्षण होते हैं—वह मलिनमुख, उद्वेगपूर्वक देखनेवाला,
स्रस्तोत्तरोयो विमनाः स्तम्भकुड्यादिभिस्तथा।<br>प्रच्छादयति चात्मानं लज्जते त्वरते तथा॥ १२खिसकती हुई चादरवाला, उदास, खम्भे और भीतकी आड़में अपनेको छिपानेकी चेष्टा करनेवाला, लज्जित तथा शीघ्रता