भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 895, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 895
* अध्याय २२४ *८८५
रक्ष्यश्चैव प्रयत्नेन ज्ञातिभेदस्तथात्मनः।<br>ज्ञातयः परितप्यन्ते सततं परितापिताः ॥ १३<br>तथापि तेषां कर्तव्यं सुगम्भीरेण चेतसा।<br>ग्रहणं दानमानाभ्यां भेदस्तेभ्यो भयंकरः ॥ १४<br>न ज्ञातिमनुगृह्णन्ति न ज्ञातिं विश्वसन्ति च।<br>ज्ञातिभिर्भेदनीयास्तु रिपवस्तेन पार्थिवैः ॥ १५<br>भिन्ना हि शक्या रिपवः प्रभूताः<br>  स्वल्पेन सैन्येन निहन्तुमाजौ।<br>सुसंहतानां हि तदस्तु भेदः<br>  कार्यो रिपूणां नयशास्त्रविद्भिः ॥ १६उसकी जातिमें भेद उत्पन्न कर दे और प्रयत्नपूर्वक अपने जाति-भेदकी रक्षा करे। यद्यपि संतप्त भाई-बन्धु राजाकी उन्नति देखकर जलते रहते हैं, तथापि राजाको दान और सम्मानद्वारा उनको मिलाये रखना चाहिये; क्योंकि जातिगत भेद बड़ा भयंकर होता है। जातिवालोंपर प्रायः लोग अनुग्रहका भाव नहीं रखते और न उनका विश्वास ही करते हैं, इसलिये राजाओंको चाहिये कि जातिमें फूट डालकर शत्रुको उनसे अलग कर दें। इस भेद-नीतिद्वारा भिन्न किये गये शत्रुओंके विशाल समूहको भी संग्रामभूमिमें थोड़ी-सी सुसंगठित सेनासे ही नष्ट किया जा सकता है, अतएव नीतिकुशल लोगोंको सुसंगठित शत्रुओंके प्रति भी भेदनीतिका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ८—१६ ॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे भेदप्रशंसा नाम त्रयोविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें भेद-प्रशंसा नामक दो सौ तेईसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २२३ ॥


दो सौ चौबीसवाँ अध्याय

दान-नीतिकी प्रशंसा

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
सर्वेषामप्युपायानां दानं श्रेष्ठतमं मतम्।<br>सुदत्तेनेह भवति दानेनोभयलोकजित् ॥ १दान सभी उपायोंमें सर्वश्रेष्ठ है। प्रचुर दान देनेसे मनुष्य दोनों लोकोंको जीत लेता है।
न सोऽस्ति राजन् दानेन वशगो यो न जायते।<br>दानेन वशगा देवा भवन्तीह सदा नृणाम् ॥ २राजन्! ऐसा कोई नहीं है जो दानद्वारा वशमें न किया जा सके। दानसे देवतालोग भी सदाके लिये मनुष्योंके वशमें हो जाते हैं।
दानमेवोपजीवन्ति प्रजाः सर्वा नृपोत्तम।<br>प्रियो हि दानवाँल्लोके सर्वस्यैवोपजायते ॥ ३नृपोत्तम ! सारी प्रजाएँ दानके बलसे ही पालित होती हैं। दानी मनुष्य संसारमें सभीका प्रिय हो जाता है।
दानवानचिरेणैव तथा राजा परान् जयेत्।<br>दानवानेव शक्नोति संहतान् भेदितुं परान् ॥ ४दानशील राजा शीघ्र ही शत्रुओंको जीत लेता है। दानशील ही संगठित शत्रुओंका भेदन करनेमें समर्थ हो सकता है।
यद्यप्यलुब्धगम्भीराः पुरुषाः सागरोपमाः।<br>न गृह्णन्ति तथाप्येते जायन्ते पक्षपातिनः ॥ ५यद्यपि निर्लोभ तथा समुद्रके समान गम्भीर स्वभाववाले मनुष्य स्वयं दानको अङ्गीकार नहीं करते, तथापि वे (भी दानी व्यक्तिके) पक्षपाती हो जाते हैं।
अन्यत्रापि कृतं दानं करोत्यन्यान् यथा वशे।<br>उपायेभ्यः प्रशंसन्ति दानं श्रेष्ठतमं जनाः ॥ ६अन्यत्र किया गया दान भी अन्य लोगोंको अपने वशमें कर लेता है, इसलिये लोग सभी उपायोंमें श्रेष्ठतम दानकी प्रशंसा करते हैं।