मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८८६ * मत्स्यपुराण *
| दानं श्रेयस्करं पुंसां दानं श्रेष्ठतमं परम्।<br>दानवानेव लोकेषु पुत्रत्वे ध्रियते सदा॥ ७<br>न केवलं दानपरा जयन्ति<br>भूर्लोकमेकं पुरुषप्रवीराः।<br>जयन्ति ते राजसुरेन्द्रलोकं<br>सुदुर्जयं यो विबुधाधिवासः॥ ८ | दान पुरुषोंका कल्याण करनेवाला तथा परम श्रेष्ठ है। लोकमें दानशील व्यक्तिकी सर्वदा पुत्रकी भाँति प्रतिष्ठा होती है। दानपरायण पुरुषश्रेष्ठ केवल एक भूलोकको ही अपने वशमें नहीं करते, प्रत्युत वे अत्यन्त दुर्जय देवराज इन्द्रके लोकको भी, जो देवताओंका निवासस्थान है, जीत लेते हैं॥ १—८॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे राजधर्मदानप्रशंसा नाम चतुर्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२४॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दान-प्रशंसा नामक दो सौ चौबीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२४॥
दो सौ पचीसवाँ अध्याय
दण्डनीतिका वर्णन
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| न शक्या ये वशे कर्तुमुपायत्रितयेन तु।<br>दण्डेन तान् वशीकुर्याद् दण्डो हि वशकृन्नृणाम्॥ १<br>सम्यक् प्रणयनं तस्य तथा कार्यं महीक्षिता।<br>धर्मशास्त्रानुसारेण सुसहायेन धीमता॥ २<br>तस्य सम्यक् प्रणयनं यथा कार्यं महीक्षिता।<br>वानप्रस्थांश्च धर्मज्ञान् निर्ममान् निष्परिग्रहान्॥ ३<br>स्वदेशे परदेशे वा धर्मशास्त्रविशारदान्।<br>समीक्ष्य प्रणयेद् दण्डं सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम्॥ ४<br>आश्रमी यदि वा वर्णी पूज्यो वाथ गुरुर्महान्।<br>नादण्ड्यो नाम राज्ञोऽस्ति यः स्वधर्मेण तिष्ठति॥ ५<br>अदण्ड्यान् दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन्।<br>इह राज्यात् परिभ्रष्टो नरकं च प्रपद्यते॥ ६<br>तस्माद् राज्ञा विनीतेन धर्मशास्त्रानुसारतः।<br>दण्डप्रणयनं कार्यं लोकानुग्रहकाम्यया॥ ७<br>यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा।<br>प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत् साधु पश्यति॥ ८<br>बालवृद्धातुरयतिद्विजस्त्रीविधवा यतः।<br>मात्स्यन्यायेन भक्ष्येरन् यदि दण्डं न पातयेत्॥ ९<br>देवदैत्योरगगणाः सर्वे भूतपतत्रिणः।<br>उत्क्रामयेयुर्मर्यादां यदि दण्डं न पातयेत्॥ १० | राजन्! जो (पूर्वोक्त सामादि) तीनों उपायोंके द्वारा वशमें नहीं किये जा सकते, उन्हें दण्डनीतिके द्वारा वशमें करे; क्योंकि दण्ड मनुष्योंको निश्चयरूपसे वशमें करनेवाला है। बुद्धिमान् राजाको सम्यक्-रूपसे उस दण्डनीतिका प्रयोग धर्मशास्त्रके अनुसार पुरोहित आदिकी सहायतासे करना चाहिये। उस दण्डनीतिका सम्यक् प्रयोग जिस प्रकार करना चाहिये, उसे सुनिये। राजाको अपने देशमें अथवा पराये देशमें वानप्रस्थाश्रमी, धर्मशील, ममतारहित, परिग्रहहीन और धर्मशास्त्रप्रवीण विद्वान् पुरुषोंकी परिषद्द्वारा भलीभाँति विचार कर दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये; क्योंकि सब कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। सभी आश्रमधर्मके व्यक्ति, ब्रह्मचारी, पूज्य, गुरु, महापुरुष तथा अपने धर्ममें स्थित रहनेवाला कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है, जो राजाके द्वारा दण्डनीय न हो; किंतु अदण्डनीय पुरुषोंको दण्ड देने तथा दण्डनीय पुरुषोंको दण्ड न देनेसे राजा इस लोकमें राज्यसे च्युत हो जाता है और मरनेपर नरकमें पड़ता है। इसलिये विनयशील राजाको लोकानुग्रहकी कामनासे धर्मशास्त्रके अनुसार ही दण्डनीतिका प्रयोग करना चाहिये। जिस राज्यमें श्यामवर्ण, लाल नेत्रवाला और पापनाशक दण्ड विचरण करता है तथा राजा ठीक-ठीक निर्णय करनेवाला होता है वहाँ प्रजाएँ कष्ट नहीं झेलतीं। यदि राज्यमें दण्डनीतिकी व्यवस्था न रखी जाय तो बालक, वृद्ध, आतुर, संन्यासी, ब्राह्मण, स्त्री और विधवा—ये सभी मात्स्यन्यायके अनुसार आपसमें एक-दूसरेको खा जायँ। यदि राजा दण्डकी व्यवस्था न करे तो सभी देवता, दैत्य, सर्पगण, प्राणी तथा पक्षी मर्यादाका उल्लङ्घन कर जायँगे॥ १—१०॥ |