मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २२६ * | ८८७ |
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| एष ब्रह्माभिशापेषु सर्वप्रहरणेषु च।<br>सर्वविक्रमकोपेषु व्यवसाये च तिष्ठति॥ ११<br>पूज्यन्ते दण्डिनो देवैर्न पूज्यन्ते त्वदण्डिनः।<br>न ब्रह्माणं विधातारं न पूषार्यमणावपि॥ १२<br>यजन्ते मानवाः केचित् प्रशान्ताः सर्वकर्मसु।<br>रुद्रमग्निं च शक्रं च सूर्याचन्द्रमसौ तथा॥ १३<br>विष्णुं देवगणांश्चान्यान् दण्डिनः पूजयन्ति च।<br>दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति॥ १४<br>दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः।<br>राजदण्डभयादेव पापाः पापं न कुर्वते॥ १५<br>यमदण्डभयादेके परस्परभयादपि।<br>एवं सांसिद्धिके लोके सर्वं दण्डे प्रतिष्ठितम्॥ १६<br>अन्धे तमसि मज्जेयुर्यदि दण्डं न पातयेत्।<br>यस्माद् दण्डो दमयति दुर्मदान् दण्डयत्यपि।<br>दमनाद् दण्डनाच्चैव तस्माद् दण्डं विदुर्बुधाः॥ १७<br>दण्डस्य भीतैस्त्रिदशैः समेतै-<br>भागो धृतः शूलधरस्य यज्ञे।<br>दत्तं कुमारे ध्वजिनीपतित्वं<br>वरं शिशूनां च भयाद् बलस्थम्॥ १८ | यह दण्ड ब्राह्मणके शाप, सभीके अस्त्र-शस्त्र, सभी प्रकारके पराक्रमपूर्वक क्रोधसे किये गये क्रिया-कलाप और व्यवसायमें स्थित रहता है। दण्ड देनेवाले व्यक्ति देवताओंद्द्वारा पूज्य हैं, किंतु दण्ड न देनेवालोंकी पूजा कहीं भी नहीं होती। ब्रह्मा, पूषा और अर्यमा सभी कार्योंमें शान्त रहते हैं, इसलिये कोई भी मनुष्य उनकी पूजा नहीं करता। साथ ही दण्ड देनेवाले रुद्र, अग्नि, इन्द्र, सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु एवं अन्य देवगणोंकी सभी लोग पूजा करते हैं। दण्ड सभी प्रजाओंपर शासन करता है तथा दण्ड ही सबकी रक्षा करता है। दण्ड सभीके सो जानेपर भी जागता रहता है, अतएव बुद्धिमान् लोग दण्डको धर्म मानते हैं। कुछ पापी राजदण्डके भयसे, कुछ यमराजके दण्डके भयसे और कतिपय पारस्परिक भयसे भी पापकर्म नहीं करते। इस प्रकार इस प्राकृतिक जगत्में सभी कुछ दण्डपर ही प्रतिष्ठित है। यदि दण्ड न दिया जाय तो प्रजा घोर अंधकारमें डूब जाय। चूँकि दण्ड दमन करता है और दुर्मदोंको दण्ड भी देता है, इसलिये दमन करने तथा दण्ड देनेके कारण बुद्धिमान् लोग उसे दण्ड मानते हैं। दण्डके भयसे डरे हुए समस्त देवताओंने यज्ञमें शिवजीका भाग निश्चित किया है और भयके कारण ही स्वामी कार्तिकेयको शैशवावस्थामें ही सारी देवसेनाका सेनापतित्व और वरदान प्रदान किया गया है॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे राजधर्मे दण्डप्रशंसा नाम पञ्चविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २२५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके राजधर्म-प्रकरणमें दण्डप्रशंसा नामक दो सौ पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २२५॥
दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय
सामान्य राजनीतिका निरूपण
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| दण्डप्रणयनार्थाय राजा सृष्टः स्वयम्भुवा।<br>देवभागानुपादाय सर्वभूतादिगुप्तये॥ १<br>तेजसा यदमुं कश्चिन्नैव शक्नोति वीक्षितुम्।<br>ततो भवति लोकेषु राजा भास्करवत्प्रभुः॥ २ | राजन्! ब्रह्माने समस्त प्राणियोंकी रक्षाके निमित्त दण्डका प्रयोग करनेके लिये देवताओंके अंशोंको लेकर राजाकी सृष्टि की है। चूँकि तेजसे देदीप्यमान होनेके कारण कोई भी उसकी ओर देख नहीं सकता, इसलिये राजा लोकमें सूर्यके समान |