मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २३१ * | ९११ |
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| देवतार्चां तु गत्वा वै स्नानमाच्छाद्य भूषयेत्।<br>पूजयेच्च महाभाग गन्धमाल्यान्नसम्पदा॥ १०<br>मधुपर्केण विधिवदुपतिष्ठेदनन्तरम्।<br>तल्लिङ्गेन च मन्त्रेण स्थालीपाकं यथाविधि।<br>पुरोधा जुहुयाद् वह्नौ सप्तरात्रमतन्द्रितः॥ ११<br>विप्रांश्च पूज्या मधुरान्नपानैः<br>सदक्षिणं सप्तदिनं नरेन्द्र।<br>प्राप्तेऽष्टमेऽह्नि क्षितिगोप्रदानैः<br>सकाञ्चनैः शान्तिमुपैति पापम्॥ १२ | उपर्युक्त विकारोंके उत्पन्न होनेपर वेदज्ञ पुरोहित देवमूर्तिके पास जाकर उसे स्नान कराये, वस्त्रादिसे अलंकृत करे तथा चन्दन, पुष्पमाला और भक्ष्यपदार्थसे उसकी पूजा करे। तदनन्तर विधिपूर्वक मधुपर्क निवेदन करे। फिर वह पुरोहित ब्राह्मण सावधानीपूर्वक उक्त प्रतिमाके मन्त्रसे स्थालीपाकद्वारा सात दिनोंतक विधिपूर्वक अग्निमें आहुति डाले। नरेन्द्र! उक्त सातों दिनोंतक मधुर अन्न-पानादि सामग्रियोंद्वारा तथा उत्तम दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंकी पूजा करनी चाहिये। आठवें दिन पृथ्वी, सुवर्ण तथा गौका दान करनेसे पाप शान्त हो जाता है॥ ६—१२ ॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावर्चवाधिकारो नाम त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसङ्गमें पूजाधिकार नामक दो सौ तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २३० ॥
दो सौ इकतीसवाँ अध्याय
अग्निसम्बन्धी उत्पातके लक्षण तथा उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच | गर्गजीने कहा— |
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| अनग्निर्ददीप्यते यत्र राष्ट्रे यस्य निरिन्धनः।<br>न दीप्यते चेन्धनवांस्तद्राष्ट्रं पीड्यते नृपैः॥ १ | जिस देशमें ईंधनके बिना ही अग्नि जल उठती है और ईंधन लगानेपर भी अग्नि प्रज्वलित नहीं होती, वह देश राजाओंसे पीड़ित होता है। |
| प्रज्वलेदप्सु मांसं वा तदर्थं वापि किञ्चन।<br>प्राकारं तोरणं द्वारं नृपवेश्म सुरालयम्॥ २<br>एतानि यत्र दीप्यन्ते तत्र राज्ञो भयं भवेत्।<br>विद्युता वा प्रदह्यन्ते तदापि नृपतेर्भयम्॥ ३ | जहाँ जलमें मांस जलने लगता है या उसका कोई भाग जल जाता है, किलेकी चहारदीवारी, प्रवेशद्वार, तोरण, राजभवन और देवालय—ये अकस्मात् जल उठते हैं वहाँ राजाको भय प्राप्त होता है। यदि ये उपर्युक्त वस्तुएँ बिजली गिरनेसे जल जाती हैं तब भी राजाको भय प्राप्त होता है। |
| अनैशानि तमांसि स्युर्विना पांसुरजांसि च।<br>धूमश्चानग्निजो यत्र तत्र विन्द्यान्महाभयम्॥ ४ | जहाँ रात्रि तथा धूलि एवं रजःकणोंके बिना ही अन्धकार छा जाय और अग्निके बिना धुआँ दिखायी पड़े, वहाँ महाभयकी प्राप्ति जाननी चाहिये। |
| तडित् त्वनभ्रे गगने भयं स्यादृक्षवर्जिते।<br>दिवा सतारे गगने तथैव भयमादिशेत्॥ ५ | बादल और नक्षत्रोंसे रहित आकाशमें बिजली कौंधने लगे तो भय प्राप्त होता है। इसी प्रकार दिनमें गगनमण्डल तारायुक्त हो जाय तो भी उसी प्रकारका भय कहना चाहिये॥१—५॥ |