मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९१२ * मत्स्यपुराण *
| ग्रहनक्षत्रवैकृत्ये ताराविषमदर्शने।<br>पुरवाहनयानेषु चतुष्पान्मृगपक्षिषु॥ ६<br>आयुधेषु च दीप्तेषु धूमायत्सु तथैव च।<br>निगमत्सु च कोशाच्च संग्रामस्तुमुलो भवेत्॥ ७<br>विनाग्निं विस्फुलिङ्गाश्च दृश्यन्ते यत्र कुत्रचित्।<br>स्वभावाच्चापि पूर्यन्ते धनूंषि विकृतानि च॥ ८<br>विकारश्चायुधानां स्यात् तत्र संग्राममादिशेत्।<br>त्रिरात्रोपोषितश्चात्र पुरोधाः सुसमाहितः॥ ९<br>समिद्भिः क्षीरवृक्षाणां सर्षपैश्च घृतेन च।<br>होमं कुर्यादग्निमन्त्रैर्ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत्॥ १०<br>दद्यात् सुवर्णं च तथा द्विजेभ्यो<br>गाश्चैव वस्त्राणि तथा भुवं च।<br>एवं कृते पापमुपैति नाशं<br>यदग्निवैकृत्यभवं द्विजेन्द्र॥ ११ | ग्रहों और नक्षत्रोंमें विकारका हो जाना, ताराओंमें विषमताका दिखायी पड़ना, ग्राम, वाहन, रथ, चौपाये, मृग, पक्षी तथा शस्त्रास्त्रोंका अपने-आप प्रज्वलित हो उठना अथवा धूमिल हो जाना और कोशसे अस्त्रादिका निकलना तुमुल संग्रामका सूचक है। जहाँ-कहीं भी अग्निके बिना चिनगारियाँ दिखायी पड़ने लगें, स्वाभाविक ढंगसे ही धनुषकी डोरियाँ चढ़ जायें या विकृत हो जायें तथा शस्त्रास्त्रोंमें विकार उत्पन्न हो जाय तो वहाँ संग्राम बतलाना चाहिये। ऐसी दशामें वहाँका पुरोहित तीन रात्रितक उपवासकर अत्यन्त समाहित-चित्तसे दूधवाले वृक्षोंकी लकड़ियों, सरसों तथा घीसे अग्नि-मन्त्रोंद्वारा हवन करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा उन्हें सुवर्ण, गौएँ, वस्त्र और पृथिवीका दान दे। द्विजेन्द्र! ऐसा करनेसे अग्नि-विकार-सम्बन्धी पाप नष्ट हो जाता है॥ ६—११॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽद्भुतशान्तावग्निवैकृत्यं नामैकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अद्भुत-शान्तिके प्रसंगमें अग्निविकार नामक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २३१॥
दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय
वृक्षजन्य उत्पातके लक्षण और उनकी शान्तिके उपाय
| गर्ग उवाच<br>पुरेषु येषु दृश्यन्ते पादपा देवचोदिताः।<br>रुदन्तो वा हसन्तो वा स्रवन्तो वा रसान् बहून्॥ १<br>अरोगा वा विना वातं शाखां मुञ्चन्त्यथ द्रुमाः।<br>फलं पुष्पं तथाकाले दर्शयन्ति त्रिहायनाः॥ २<br>पूर्ववत् स्वं दर्शयन्ति फलं पुष्पं तथान्तरे।<br>क्षीरं स्नेहं तथा रक्तं मधु तोयं स्रवन्ति च॥ ३<br>शुष्यन्त्यरोगाः सहसा शुष्का रोहन्ति वा पुनः।<br>उत्तिष्ठन्तीह पतिताः पतन्ति च तथोत्थिताः॥ ४<br>तत्र वक्ष्यामि ते ब्रह्मन् विपाकं फलमेव च। | गर्गजीने कहा—ब्रह्मन्! जिन ग्रामोंमें दैव-प्रेरित वृक्ष अपने-आप रोते, हँसते, प्रचुर परिमाणमें रस बहाते हुए किसी रोग अथवा वायुके बिना डालियाँ गिराते हैं, तीन ही वर्षके वृक्ष असमयमें फलने-फूलने लगते हैं, अन्यत्र कोई-कोई वृक्ष ऋतुकालकी भाँति अपनेको फलों और पुष्पोंसे लदे हुए दिखलाते हैं तथा दुग्ध, तैल, रक्त, मधु और जल बहाते हैं, किसी रोगके बिना ही सहसा सूख जाते हैं अथवा सूखे हुए पुनः अङ्कुरित हो जाते हैं, गिरे हुए उठकर खड़े हो जाते हैं तथा खड़े हुए गिर पड़ते हैं, वहाँ होनेवाला परिणाम और फल मैं आपको बतला रहा हूँ, सुनिये॥ १—४ ½ ॥ |