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मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)

Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary

भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा

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' ८ के बाद मीराँ की मानसिक स्थिति अत्यन्त करुण हो उठी है। "भर भर धोबा धोये नैन, साधॉ रो सग जोवति" मीराँ "आमण दूमणी" हो उठी हैं। अपने दृढ भक्ति-भाव और समर्पण के बाद भी सतत महल-निवासिनी मीराँ का अपने को नितान्त एकाकिनी पाकर क्षणिक आकुलता का अनुभव करना असंगत भी नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि प्राप्त वृत्तान्त और प्राप्त पदो मे सामञ्जस्य की एक कडी सिद्ध होने वाले इन पदो से व्यक्त होती अन्य भावनाओ और घटनाओ का पक्षपात विहीन विश्लेषण इतिहास की सुदृढ रूपरेखा बनाने मे सफल हो सके। विभिन्न अलौकिक गाथाओ का वर्णन भी इन सघर्ष द्योतक पदो का एक प्रधान अग है। राणा द्वारा मीराँ तक "जहर पियाला" भेजे जाने की कथा प्राय सर्वत्र ही मिलती है। पदाभिव्यक्तियो और प्राप्त सामग्री के आधार पर भी यह सुनिश्चित हो जाता है कि मीराँ के साधु-समागम के कारण फैलती बदनामी के कारण राणा ने मीराँ तक "जहर पियाला" भेजने मे ही अपना कल्याण समझा। अत कुछ लोगो के मतानुसार अपने एक मुँहलगे मुसाहिब के द्वारा और अन्य कुछ किम्बदन्तियो के अनुसार अपनी बहन ऊदाँ बाई के द्वारा यह "पियाला" मीराँ तक पहुँचा दिया जाता है। पदाभिव्यक्तियो से यह प्रकट होता है कि ननद ऊदाँ इस "पियाले" के रहस्य को जानती थी और कई बार मीराँ को इससे आगाह भी कर चुकी थी। नाभादास मे भी मीराँ को बन्धुजन द्वारा दिये गये विष की चर्चा मिलती है। इस विष- पान का प्रभाव मीराँ पर क्या पडा, यह सर्वथा अनिश्चित ही है। मुंशीजी भी दोनो ही मान्यताओ का उल्लेख करते है। एक मान्यता के अनुसार मीराँ की मृत्यु हो जाती है और मरते मरते वे विष लानेवाले राणा के मुँहलगे मुसाहिब को श्राप देती है, जिस के कारण आज तक भी उस मुसाहिब के वश मे धन और जन की वृद्धि एक साथ नही हो पाती। दूसरी मान्यता के अनुसार मीराँ किसी रहस्यमय तरीके से बच जाती है और जब उनके पितृव्य बीरमदेव को इस अप्रिय घटना का पता चलता है तो मीराँ को लिवा ले जाते है। परन्तु यहाँ भी साधु-समागम मे गहरी रोक-टोक है। अत एक दिन मीराँ दोनो ही कुलो और सम्पूर्ण राज वैभव को "तजि बटुक की नाई" चली जाती हैं अपने आराध्य के आश्रय मे। अस्तु, यही सम्भव प्रतीत होता है कि मीराँ ने अपने जीवन की किसी घटना का विष-पान के रूपक मे वर्णन किया हो और नाभादास ने भी