मीराँ बृहद् पदावली (भक्त शिरोमणि मीराबाई - सम्पूर्ण पद सटीक)
Meera Brihad Padavali with Hindi Commentary
भक्त शिरोमणि मीराबाई / डॉ. मुरलीधर श्रीवास्तव द्वारा
पृष्ठ 7, कुल 365 में से
संदर्भ में पढ़ेंघ कितनी ही तरह से कही गयी हैं और जब एक पद की कही बात को दूसरे पदो मे उल्लिखित बातो से मिलाया जाता है तो उनमे प्राय विरोधी, असगत और असम्बद्ध बाते ही अधिक मिलती हैं। मीराँ का अपने कुटुम्बियो से मतभेद और सघर्ष की बात कालातर से चली आ रही है। नाभादास ने अपने छप्पय मे इसका उल्लेख किया और प्रियादास ने कई कवित्तो मे इस मतभेद और सघर्ष की व्याख्या की। वह मतभेद और सघर्ष मीराँ के जीवन मे किस रूप मे उपस्थित हुआ, उसने क्या-क्या रूप धारण किए, उसका परिणाम क्या हुआ, इन सभी बातो का स्पष्ट उल्लेख मीराँ के पदो मे मिलना कोई आश्चर्य की बात नही है। परतु उस सघर्ष की अभिव्यक्ति मीराँ ने कितनी और किस रूप मे की होगी, यह केवल अनुमान- की वस्तु है। सघर्षाभिव्यक्ति के जितने पद उपलब्ध हैं उनका बहुत थोडा अश ही मीराँ का लिखा जान पडता है। मेरा अनुमान है कि मीराँ का अपने कुटुम्बियो मे मतभेद और सघर्ष परवर्ती काल के कितने ही गीतो और नाट्य-रूपको का विषय बन गया था और उन गीतो और नाट्य-रूपकों के रचयिता कवि सम्भव प्रमाण¹ द्वारा उस सघर्ष का विकृत और अतिरजित रूप जनता के सामने उपस्थित करते थे। वे ही गीत और नाट्य-रूपको के सम्वाद आगे चलकर मीराँ की रचना के रूप मे प्रसिद्ध हो गए। अस्तु, सघर्षाभिव्यक्ति के उपलब्ध सभी पदो को मीराँ की प्रामाणिक रचना मानना ठीक नही है। सघर्षाभिव्यक्ति से इतर मीराँ के पदो मे जो अनेक विचार-धाराएँ और विविध प्रकार की भावाभिव्यक्ति मिलती है, उन सभी को मीराँ की रचना मानना कठिन जान पड़ता है। विशेष रूप से मौखिक परम्परा से प्राप्त मुक्तक रचनाओ मे मिलावट की गुंजाइश सर्वदा बनी रहती है। फिर भी यह असम्भव नही है कि एक ही कवि की रचना मे अनेक प्रकार की १ विद्वानो ने प्रत्यक्ष, अनुमान, आप्त शब्द, उपमान आदि प्रमाणो के साथ एक सम्भव प्रमाण भी माना है। उदाहरण के लिए शिव और पार्वती का विवाह पुराणो मे वर्णित है; परतु उसमे यह नही लिखा है कि शिव के बाराती कौन थे और शिव को वर रूप मे देखकर पार्वती, मैना, हिमालय आदि ने क्या क्या -भाव व्यक्त किए। परतु परवर्ती कवियो ने सम्भव प्रमाण द्वारा शिव की बारात, मैना का खेद आदि का विस्तृत वर्णन किया है। यही है सम्भव प्रमाण।