भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

८० मुद्राराक्षस—

( और भी )

अरे, केवल बहु गहिना पहिरि राजा होइ न कोय ।
अहो, जाकी नहि आज्ञा टरै, सो नृप तुम सम होय ॥

चाणक्य ।—( सुन कर आप ही आप ) भला पहिले ने तो
५ देवता रूप शरद के वर्णन मे आशीर्वाद दिया, पर इस
दूसरे ने क्या कहा ? [कुछ सोच कर ] अरे जाना, यह
सब राक्षस की करतूत है । अरे दुष्ट राक्षस ! क्या तू नहीं
जानता कि अभी चाणक्य सो नहीं गया है ?

चन्द्रगुप्त ।—अजो वैहीनर ! इन दोनों गानेवालों को लाख
१० लाख मोहर दिलवा दो ।
वैहीनर ।—जो आज्ञा महाराज ( उठ कर जाना चाहता है ) ।
चाणक्य ।—वैहीनर, ठहर अभी मत जा । वृषल, यह अर्थ
कुपात्र को इतना क्यों देते हो ?
चन्द्रगुप्त ।—आप मुझे सब बातों में योंही रोक दिया करते
१५ ह, तब यह मेरा राज क्या है वरन उलटा बन्धन है ।
चाणक्य । - वृषल ! जो राजा आप असमर्थ होते हैं उन म
इतना ही तो दोष है, इस से जो ऐसी इच्छा हो तो तुम
अपने राज का प्रबन्ध आप कर लो ।
चन्द्रगुप्त । बहुत अच्छा, आज से मैं ने सब काम सम्हाला ।
२० चाणक्य ।—इस से अच्छी और क्या बात है, तो मे भी
अपने अधिकार पर सावधान हू ।
चन्द्रगुप्त ।—जब यही है तो पहिले मै पूछता ह कि कौमुदी-
महोत्सव का निषेध क्यों किया गया ?
चाणक्य ।—मै भी यही पूछता हू कि उस के होने का प्रयोजन
२५ क्या था ?
चन्द्रगुप्त ।—पहिले तो मेरी आज्ञा का पालन ।