भारतकोश
मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

मुद्राराक्षसम् (विशाखदत्त - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी अनुवाद)

Mudrarakshasam of Vishakhadatta Hindi

विशाखदत्त (अनुवादक: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) द्वारा

स्रोत: Mudrarakshas Drama translated into Hindi by Bharatendu Harishchandra (1925) (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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तृतीय अङ्क । ८३

इसी से वे भी मलयकेतु के पास चले गए, बस, यही उन लोगों की उदासी का कारण है । चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! जब इन सब के भागने का उद्यम जानते ही थे तो क्यो न रोक रक्खा ? चाणक्य ।—ऐसा कर नही सके । ५ चन्द्रगुप्त ।—क्या आप इस मे असमर्थ हो गए वा कुछ उस मे भी प्रयोजन था ? चाणक्य ।—असमर्थ कैसे हो सकते हैं ? उस मे भी कुछ प्रयोजन ही था । चन्द्रगुप्त ।— आर्य्य ! वह प्रयोजन मै सुना चाहता हूं । १० चाणक्य ।—सुनो और भूल मत जाओ । चन्द्रगुप्त ।—आर्य्य ! मै सुनता हई हूं, भूलूगा भी नही, कहिए । चाणक्य ।—अब जो लोग उदास हो गए हैं या बिगड़ गए हैं उन के दो ही उपाय हैं, या तो फिर से उन पर अनुग्रह १५ करें या उन को दण्ड दें और मद्रभट, पुरुषदत्त से जो अधिकार ले लिया गया है तो अब उन पर अनुग्रह यही है कि फिर उन को उन का अधिकार दिया जाय, और यह हो नही सकता, क्योंकि उन को मृगया, मद्यपानादिक का जो व्यसन है इस से इस योग्य नही हैं कि हाथी, २० घोड़ों को सम्हाले और सब सेना की जड़ हाथी, घोड़े ही हैं । वैसे ही हिगुरात, बलगुप्त को कौन प्रसन्न कर सकता है, क्योंकि उन को सब राज्य पाने से भी सन्तोष न होगा, और राजसेन भागुरायण तो धन और प्राण के डर से भागे हैं; ये तो प्रसन्न होई नही सकत, और रोहिताक्ष, २५ विजयवर्म्मा का तो कुछ पूछना ही नही है, क्योकि वे तो और नातेदारों के मान से जलते हैं और उन का